बुधवार, 9 अप्रैल, 2008

चुरा के मेरी पोस्ट कहां तुम चले

मेरी पोस्ट वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़ हूबहू शशि भाई ने अपने ब्लाग पर डाल दी है। उन्होंने कर्टसी में मेरा नाम भी नहीं दिया। बहुत आहत महसूस कर रहा हूं।
शशि भूषण जी बेहद प्रतिभाशाली कथाकार हैं व्यक्तिगत रूप से उनकी कहानियों का मैं बड़ा प्रशंसक हूं। पता नहीं उन्होंने यह क्यों किया। शब्द दर शब्द पोस्ट एक जैसी है। मैंने 17 अगस्त 2007 को यह पोस्ट लिखी थी .. उनके ब्लाग पर यह 23 सितम्बर 2007 की तारीख में है। अब आप सब ही न्याय करें ....


मेरी पोस्ट
http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post.html

शशि जी की पोस्ट
http://kathavartashashi.blogspot.com/2007/09/blog-post_4764.html

गुरुवार, 13 मार्च, 2008

एट एण्ड ए हाफ : कलात्मक क्राइसिस के बीच काँपते हुए स्वप्न

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

आज बड़े दिनों बाद कुछ फुर्सत निकली तो फेडेरिको फेलिनी की फिल्म 'एट एण्ड ए हाफ' देखी। इस फिल्म को वर्ष 1963 में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म का एकेडमी एवार्ड मिला था। फेलिनी इतालवी सिनेमा की बेहद चर्चित शख्सियत रहे हैं। 'एट एण्ड ए हाफ' का नाम पहले था 'ला बेला कन्फ्यूजियोन' मतलब 'द ब्यूटीफुल कन्फ्यूज़न'। फेलिनी की शख्सियत को ध्यान में रखते हुए तो यही नाम ज्यादा ठीक था। यह फिल्म फिल्म मेकिंग के बारे में है, नायक गुइदो एक निर्देशक है और उसे लगता है कि उसके आस पास की दुनिया ठीक उसकी रचनात्मकता की ही तरह डूब रही है। यह फिल्म कहानी कहने की कला में समय के एक द्रव की तरह के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण है।

फिल्म की शुरुआत में गुइदो एक कार में ट्रैफिक जाम में फंसा हुआ है उसकी कार के शीशे बन्द हैं और कार में धुँआ भर गया है, उसकी साँस घुट रही है और वह अचानक कार की छत से ऊपर आसमान में उड़ जाता है। थोड़ी ही देर बाद दो आदमी दिखते हैं, जिनमें से एक के हाथ में एक रस्सी है जिसका एक सिरा गुइदो के पैर में बंधा हुआ है, जिसके माध्यम से वह उसे खींच कर उतार लेता है। यह एक प्रतीक है कि एक रचनात्मक आदमी के जीवन में दुनियावी चीज़ों का असहनीय धुंआ हमेशा भरा रहता है जिससे वह कितना भी भागना चाहे उसे वापस आना ही होता है।

गुइदो का प्रोडयूसर उसके एक ऐसे आइडिया के पीछे काफी पैसा लगा चुका है, जिसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता है यहाँ तक कि गुइदो को भी। दरअसल वह अपनी जिन्दगी की जटिलताओं को ही फिल्माना चाहता है, उसका इरादा एक परम्परागत फिल्म बनाने की बजाय एक फ्रैग्मेण्टेड फिल्म बनाने का है। गुइदो के लिए सपने ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वे सपने जो उसकी रोजमर्रा की ज़िन्दगी से निकल आते हैं। नायिकाएँ उसके पीछे पड़ी हैं कि वह उन्हें उनके रोल के बारे में बताए, लेकिन गुइदो अपनी फैंटेसीज में मग्न है। गुइदो का बचपन कैथोलिक माहौल में बीता है और विचारधारा के स्तर पर वह माक्र्सवादी है। उसकी एक ही मनोवृत्ति जो पूरी फिल्म में उभरकर सामने आती है - वह है प्रोटोगैनिज्म। फिल्म के मध्य में उसकी पत्नी लुईसा व्यथित होकर उससे कहती है कि तुम पूरी तरह से एक झूठ हो, तुम्हें सिर्फ एक बात पसन्द है और वह है पूरी दुनिया को यह दिखाना कि तुम कितने आश्चर्यजनक हो। गुइदो की बहुत सारी फैन्टेसीज़ हैं, पैसा देकर डेविल कही जाने वाली महिला सारागीना का नृत्य देखना, 'आसा निसी मासा' के चैण्ट से डरना, अपने मृत माता पिता से बात करना और ऐसी बहुत सारी चीज़ें। सबसे महत्वपूर्ण फैन्टेसी है - एक हरम की कल्पना जहाँ उसकी ज़िन्दगी में कभी न कभी आई हुई सभी औरतें हैं, यहाँ तक कि वे औरतें भी जिन्हें सिर्फ गुइदो ने देखा है और उनके साथ कभी होने की कल्पना की है, वह खुद को उनके मालिक की तरह देखता है, ताज्जुब की बात है कि उसकी पत्नी लुइसा इस हरम में एक हाउसकीपर की तरह है। पहले पहले देखने पर ये फैन्टेसीज़ एक लिबिडो का परिणाम लगती हैं, लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। हम पाते हैं कि गुइदो एक ऐसे चरित्र के रूप में है जो संसार को एक छोटे बच्चे की दृष्टि से देखता है और इसीलिये उसकी दुनिया में इतने सारे अलग-अलग संसारों के सपने हैं। फिल्म के अंत में उसकी अन्तिम फैंटेसी के रूप में भी हम देखते हैं उसकी दुनिया में शामिल सभी लोग एक सर्कस की आकृति में उसके साथ हैं और वह उन सबको फिल्म के एक सीन की तरह निर्देशत कर रहा है, और उसका बचपन का रूप सामने ट्रम्पेट बजा रहा है।
इस फिल्म में बहुत सारे प्रभाव एक साथ हैं पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक रचनात्मक जीनियस को किस तरह पूरी दुनिया समझने में असफल रहती है। गुइदो अपने जीवन की सारी औरतों को जिनमें कुमारियाँ भी हैं, प्रेमिकाएँ भी हैं पत्नी भी है, उसकी माँ भी है .. बेहद प्यार भी करता है और नफरत भी करता है पर वह उन सबके प्रति एक तरह का ईमानदार व्यक्तित्व है। वह एक निर्दोष बच्चे की तरह है और उसके आस-पास की दुनिया समझदार, परिपक्व और चालबाज बन गई है, फिर भी वह उन चालबाज और तथाकथित परिपक्व लोगों को इतना प्यार करता है कि वे उसकी फैंटेसीज का हिस्सा है। दुनिया के पास उसके लिए अनगिनत सवाल हैं, लेकिन उसके पास इनमें से किसी का भी जवाब नहीं है।

फिल्म में नायक के साथ रहने वाला फिल्म क्रिटिक हमेशा लम्बे लम्बे दार्शनिक और सैध्दान्तिक वक्तव्य बघारा करता है, जिनसे नायक ऊबता रहता है, लेकिन अन्त में फेलिनी ने उससे एक रिमार्केबल बात कहलवाई है कि ''कभी कभी नष्ट करना रचना करने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।''

रविवार, 9 मार्च, 2008

प्रकाश

प्रकाश

हमें चाहिए धूप
कि हम पढ़ सकें जीर्ण पन्नों को
सुधार सकें नये लिखे के हिज्जे

हमने बोई है आसमानी खेत पर
उजाले की कुँवारी हरी दूब
हमारा रक्त पहले से है वातावरण में
देखा है हमने आकाश के आईने में
अपने पीले चेहरों का अक्स
हम पोंछते हैं नारंगी सूरज पर जमी गर्द
इस तरह हमने आकाश को दिया है
हर ज़रूरी सामान
कि वह बना सके उजाला

हम एक पुराने लोहे जैसे
काले दिन के नागरिक हैं
हमें थोड़ा प्रकाश चाहिए

रविवार, 21 अक्‍तूबर, 2007

नया समय के हुलिये में बदलाव

आज मैंने नयासमय का हुलिया थोड़ा बदल दिया है, आशा है आप लोगों को पसन्द आयेगा, अविनाश व बोधि भाई की तर्ज पर कुछ दोस्तों के चिट्ठे भी लिंकित करना शुरू किया हैं .....

गुरुवार, 18 अक्‍तूबर, 2007

राम दोहाई पांड़े भईया

मुंह से खाली राम राम बा
छूरी बाटै आंड़े भइया,
राम दोहाई पांड़े भईया।

मची अहै अंधेर करेरे, मनई मिलिहैं हेरे हेरे।
कुलि बगुला भगतन कै ठठ्ठर, काव कही यक यक से कट्टर।
फांसै के बीसन हथकंडा, खायं खुलासा मीट औ अण्डा।
राम नाम कै धरे दुपट्टा, पियैं सराब औ खेलैं सट्टा।
रात मा करिहैं हाथ सफाई, दिन मा रहिहैं ताड़े भइया।
राम दोहाई पांड़े भईया।

माना बात चहै न माना, डेर लागै अब देख कै थाना।
हियां न्याय कै करा न आसा, सब पैसा कै अहै तमासा।
जे तहसील कचेहरी बाबू, उनके उपर और न काबू।
लेखपाल होइ औरै गांठा, बिना फीस कै उठै न लाठा
खेतिहर का सुख नहीं बदा बा, गरमी बरखा जाड़े भइया।
राम दोहाई पांड़े भईया।

जेह कै राजनीत कै पेसा, वहिकी चमकी रहै हमेसा।
यइ सब अहैं सांड़ सरकारी, नास करैं सारी फुलवारी।
मौज करैं अच्छी कद काठी, भैंस वही कै जेहि कै लाठी।
जेकै लहिगै बाटै यहिमा, दोषी तबौ दहाड़ै भइया,
राम दोहाई पांड़े भईया।

उक्त कविता अवधी के लगभग एक अनाम कवि असविन्द द्विवेदी की है, जिनका बहुत कम उम्र में निधन हो गया था।
मुझे असविन्द जनोन्मुख अवधी कविता के अद्भुत कवि लगे, मैं उनकी और रचनाएं जुटाने की कोशिश में हूं ..............

शनिवार, 13 अक्‍तूबर, 2007

चे के कुछ आैर फोटो
















गुरुवार, 11 अक्‍तूबर, 2007

चे ग्वेरा के कुछ यादगार फोटोग्राफ्स


पहले सोचा था कि चे पर कुछ लिखा जाये, पर बाद में लगा कि क्यों न चे के कुछ यादगार फोटो डाल दिये जायें, यहां कुछ फोटोग्राफ्स हैं, सबसे महत्वपूर्ण फोटो वह ग्रुप फोटो है जो अमेरिकी इंटेलीजेंस के अधिकारियों ने उनके शरीर के साथ खिंचवाया था ......