गुरुवार, १३ नवम्बर २००८

आखिरी बार कब आपने अपने मन की सुनी थी?

आज यूँ कहीं पढ़ रहा था कि प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध अपनी मनःस्थिति का बेहद सम्मान करते थे। जाहिर है उनकी इन मनःस्थितियों में दो चीज+ें अवश्य थीं - बतियाना और चाय पीना। सुना है कि अपने ब्याह में वे सिर्फ इसलिए विलम्ब से पहुँचे कि नदी के किनारे किसी से बतियाने लगे थे और अपने छोटे भाई के विवाह में जाते हुए ट्रेन सिर्फ इसलिए छोड़ दी क्योंकि प्लेटफार्म पर वे इत्मीनान से चाय पीना चाहते थे। यह अलग बात है कि उस ट्रेन में उनका परिवार सवार था जो कई घण्टों तक इसके कारण परेशान हुआ।

यह सबकुछ मैं इसलिए दोहरा रहा हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि कम से कम अपनी मनःस्थिति का सम्मान करना आज के इस कठिन जीवन में हमारे लिए असम्भव सा होता जा रहा है। हम एक तरह से हमेशा हाँफते रहते हैं कमिटमेन्ट्स को पूरा करने के लिए, चाहे वे हमारे पेशे के हों या सम्बन्धों के। घड़ी के चौबीस घण्टे भी हमें कम पड़ते हैं इस भागदौड़ भरे जीवन को जीने के लिए। हम हमेशा समझौता करते हैं - अपना पसंदीदा गाना सुनना छोड़कर फोन सुनते हैं, शाम का घूमना छोड़कर लगातार काम निपटाते हैं। छुट्टियाँ (अगर वे कहीं हैं) मिलने पर भी हर पल आधे मन और आधे मस्तिष्क से अपने काम में डूबे रहते हैं। हम हर समय जवाबदेह रहते हैं और इसीलिए हम हमेशा कमर तोड़ते रहते हैं कि हमारे पास सही जवाब हों। हमारा यह समय ÷नो सर' सुनने का नहीं है और ÷यस सर!' यह दो शब्द कह पाने की स्थिति में होने के लिए हमें रोज अपने मन को कई-कई बार मारना पड़ता है। हम आकण्ठ काम में डूबे रहते हैं एक आरामदेह भविष्य की आशा के साथ।

आप खुद याद करें कि आखिरी बार कब आपने आँखें बन्द करके अपने घर में लेटकर एक धीमा रोमानी गाना बिना किसी व्यवधान के सुना था? आखिरी बार कब आपने अपनी चाय पूरे इत्मीनान के साथ सूर्यास्त को देखते हुए पी थी? कब आप बारिश में निःसंकोच भीगे थे बिना किसी डर के साथ? कब आपने एक पूरा क्रिकेट मैंच देखा था बॉल-टू-बॉल? कब आपने घर में डीवीडी पर एक बार में कोई फिल्म देखी थी? आखिरी बार कब आपने एक पूरा उपन्यास एक रीडिंग में खत्म किया था? आखिरी बार कब आप दोपहर में सोये थे और कोई नहीं था आपको जगाने वाला? आखिरी बार कब आपने अपने जीवन में आये हुए लोगों को सिर्फ याद करने के लिए याद किया था (बिना उनसे किसी काम के)? और आखिरी बार कब आपने अपनी खुशी के बारे में मतलब सिर्फ अपनी खुशी के बारे में सोचा था?

आखिरी बार कब आपने अपने मन की सुनी थी?

सोमवार, २० अक्तूबर २००८

वेलकम टू सज्जनपुर या वेलकम टू बेनेगल्स ट्रैजेडी

कल श्याम बेनेगल के नाम पर इस फिल्म को देखना हुआ। फिल्म की शुरुआत और स्टोरीटेलिंग से लगा कि फिल्म अच्छी होगी। लेकिन ज्यों-ज्यों फिल्म आगे बढ़ती गई, मन बेहद निराश हुआ। कॉमेडी बनाने की कोशिश में फिल्म का कबाड़ा हो गया। वैसे कला का यह एक सामान्य सत्य है, कि एक कलाकार को प्रयोगवादी होना चाहिए लेकिन प्रयोग के चक्कर में आप अगर अपनी कलात्मकता की असली आत्मा से विचलित हों तो शायद यह ठीक नहीं होगा। वैसे फिल्म में उन सारे प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है जो समानान्तर सिनेमा और समानान्तर सोच को प्रदर्शित करते हैं। नुक्कड़ नाटक, नौटंकी और गीतों का लोकतांत्रिक व्यवस्था में विन्यस्त भ्रष्टाचार के प्रतिवाद में जैसा उपयोग किया गया है, वह दर्शाता है कि निर्देशक के मन में इस कॉमेडी के माध्यम से एक ऐसा सैटायर रचने की कोशिश रही है जो हल्के फुल्के ढंग से बात को कहते हुए लोगों को सोचने को मजबूर कर दे।
सबसे बड़ी चीज जो अखरती है वह है फिल्म में एक प्रभावशाली कथा का अभाव। जिस एक छोटी सी कथा के चारों ओर फिल्म का सारा ताना-बाना बुना गया है, वह प्रभाव नहीं छोड़ती और सच बात तो यह कि वह पूरी तौर पर यथार्थवादी कहानी भी नहीं है। यथार्थ के स्तर पर फिल्म में कई झोल हैं, जिनके कारण श्रेयस तलपड़े और अमृता राव के चरित्रों का पूरी तरह विकास नहीं हो पाया है। चिट्ठी लेखक का जो किरदार श्रेयस ने निभाया है, उसको ठीक तरह से शिल्पित करने में निर्देशक असमर्थ रहा है। जिन्होंने कभी गाँव में या शहर की कचहरी या तहसील वगैरह में असली चिट्ठी लेखकों/अर्जीनवीसों को देखा है उन्हें यह किरदार समूचे तौर पर अवास्तविक लगेगा। निर्देशक ने उत्तर प्रदेश के एक गॉंव सज्जनपुर की तस्वीर पेश करने की कोशिश की है और यह चाहा है कि दर्शक खुद को उस गॉंव या कस्बे से जुड़ा हुआ महसूस करें। परन्तु सच्चाई यह है कि निर्देशक ने श्रेयस और अमृता के किरदारों पर केन्द्रित होने के चक्कर में कस्बाई माहौल के अन्य चरित्रों के विकास पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है, जिसके कारण यशपाल, दिव्या दत्ता जैसे मंझे हुए कलाकारों का ठीक से उपयोग तक नहीे हो पाया है। श्रेयस और अमृता के बीच फिल्माये गये कई दृश्य दोहराये हुए और अनावश्यक लगते हैं। इसका एक कारण हाल की सफलताओं के कारण श्रेयस की बढ़ी हुई मार्केट वैल्यू भी हो सकती है, क्योंकि फिल्म के प्रमोशन में भी ये दोनों सितारे गाहे-बेगाहे नजर आते रहे। मध्यांतर के बाद रबर की तरह फिल्म खिंचती हुई नजर आती है और अन्त में एक अत्यन्त अवास्तविक दृश्य है, जब हिन्दी का प्रकाशक फिल्म के नायक को एक हाथ से उसके उपन्यास की प्रति सौंपता है और दूसरे हाथ से उसकी रॉयल्टी का चेक।
हो सकता है, यह आंकलन कुछ लोगों को अतिवादी लगे, लेकिन सच यह है कि जब आप श्याम बेनेगल की फिल्म देखते हैं तो उससे कुछ अधिक उम्मीदें रखते हैं। यह फिल्म कहीं से भी बेनेगल की फिल्म नहीं लगती। कॉमेडी बनाने के फेर में यह एक ट्रैजेडी बनकर रह गयी है। हालांकि मुझे लगता है कि गम्भीर फिल्म बनाने वालों के साथ अक्सर ऐसा होता है, अभी हाल में ही नाकेश कुकनूर ने बॉम्बे टू बैंकॉक नाम से एक ऐसा ही असफल प्रयास किया था।
फिलहाल व्यक्तिगत तौर पर मुझे श्याम बाबू से कुछ ज्यादा उम्मीदें थीं।

शुक्रवार, १९ सितम्बर २००८

एक आलसी कवि की डायरी

यह एक अजीब सूनेपन का समय है। सच कहूँ तो बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा न ब्लॉग पर और न कागज पर। शायद ध्यान दूँ तो कॉलेज के रोजनामचे और चेक बुक्स के अलावा दस्तखत भी कहीं नहीं किये। इतना सूनापन तो कभी नहीं था। कुछ कुछ जीवन बचपन की गर्मियों की दोपहर जैसा हो गया है, जब हमारे पास कोई काम नहीं होता था और माँ पूरे यत्न में रहती थीं कि कैसे इसे सुला दिया जाये और लगभग-लगभग सफल भी हो जाती थीं। कभी लगता है कि ऐसी ही किसी स्थिति में निराला जी ने 'पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है' जैसा कुछ लिखा होगा। खैर वे निराला थे और जितना यह सच है उतना ही यह भी कि हम निराला नहीं हैं। इधर इस अलेखन ने कई सम्बन्ध भी खराब कर दिये हैं। कई एसाइनमेंट्स थे, जो अब कालातीत हो गये हैं। वैसे भी मैं खुद को एक धीमा लेखक मानता हूँ और इधर तो यह धीमापन एक भयंकर स्थगन में बदल गया है।

अच्छा एक बात और भी है, पढ़ इधर खूब रहा हूँ, फिल्में खूब देख रहा हूँ और खूब संगीत सुन रहा हूँ। और कभी कभी ऐसा करते हुए लगता है कि शायद समाज को ऐसे लोगों की आज ज्यादा जरूरत है। इतना कुछ और इतनी ज्यादा मात्रा में सृजित हो रहा है हमारे चारों ओर, कोई इसे नोटिस करने वाला भी तो होना चाहिए। यह जरूर है कि इस स्थगित होकर पढ़ने की प्रक्रिया में बहुत सारा कुछ ऐसा भी मिला जिसे पढ़ने का मन नहीं किया, लेकिन बहुत कुछ अच्छा भी मिला। मेरे एक वरिष्ठ कवि मित्र हैं, जिन्हें हम प्यार से भूतपूर्व कवि कहते हैं। मैं उनकी बात का आदर करते हुए यह कोट करना चाहता हूँ कि वे कभी कभी कहते हैं कि अब जब मैं कविता लिखने के बारे में सोचता हूँ तो मुझे उबकाई आती है। जब पहली बार मैंने उनके मुँह से ऐसा सुना तो मुझे बड़ा अजीब लगा लेकिन अपने इन दिनों में जब मैं उनकी बात को याद करता हूँ तो कुछ सोचने को विवश हो जाता हूँ कि आखिर किस मन:स्थिति में उन्होंने वह बात कही होगी। खैर अपना अपना स्थगन-काल है, उनका थोड़ा लम्बा हो गया, हो सकता है मेरा थोड़ा कम अवधि का हो और कल ही मैं इसी ब्लॉग पर एक कविता लिख मारूँ।

सुना है ने लेखकों ने न लिखने के कारणों पर भी विचार किया है। किशोरावस्था में पढ़ा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का 'क्या लिखूँ' टाइप कुछ याद आता है। पर यहाँ तो सामग्री की कमी नहीं है, रोज ही कोई न कोई विचार खलबली मचाता है, यहाँ बीमारी कुछ कुछ क्यों लिखूँ टाइप की है। आचार्य मम्मट ने लेखन के लिए प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास इन तीन चीज़ों की दरकार मानी थी। सोचूँ तो लगता है साला अपने पास तो इन तीनों का ही टोटा है। आज अगर मम्मट या दण्डी होते तो जरूर सबसे पहले मुझे ब्लैकलिस्टेड कर देते कि अबे! बिना रजिस्ट्रेशन के कविता लिख रहा है। खैर ब्लैकलिस्टेड तो वे वैसे भी मुझे कर देते कि ये सब जो तू कागद काला करता है दिन भर, ये कौन सी कविता है, जा हम तो नहीं मानते इसे कविता। बहिष्कार हो जाता मेरा तो। वैसे आज भी मम्मटों और दण्डियों की कमी नहीं है, जो यदा-कदा अपना दण्ड हम जैसे समकालीनी कवियों पर फिराते रहते हैं। एक मजेदार बात आपको बताता हूँ एक बार एक गरिष्ठ कवि (ये मेरा कोडवर्ड है, आपको इसके बारे में बाद में बताऊँगा) ने मुझसे प्यार से कहा कि देखो भाई बुरा मत मानो ये तुम लोग जो लिखते हो, यह सब बेकार है। कविता ऐसी होनी चाहिए जो जबान पर तुरन्त चढ़ जाये। तुरन्त उन्होंने उदाहरणार्थ की हेडिंग मारकर डैश लगाया और चार पाँच अहा! और कहा! ध्वनियों वाली कवितायें टेल दीं। मैं उस दिन अवज्ञा के मोड (ध्यान रखिए मूड नहीं मोड) में था और मैंने कहा - गुरू जी जबान पर चढ़ने की दृष्टि से देखा जाए तो दुनिया का श्रेष्ठतम साहित्य गालियाँ हैं, क्योंकि वे हर किसी की जबान पर चढ़ी रहती हैं। कहना न होगा कि मैंने उनकी शाम-वाम, पान-वान और आन-बान तीनों का मज़ा उस दिन एकसाथ खराब किया। खैर, हम कवि हैं, और बहुतों की नजर में उद्दण्ड कवि हैं, इसलिए ऐसी बातों का होना लाज़िमी है।

फिलहाल मूल समस्या पर आते हैं, न लिखने की समस्या पर। मैंने पाया है कि न लिखने के पीछे एक और बड़ा कारण है कि आप पर कुछ कालजयी टाइप लिखने का फितूर सवार हो जाता है और उस चक्कर में आप कुछ भी लिखने से परहेज करते हैं। आज भी मुझे कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं जो महाकाव्य लिख रहे हैे। आश्चर्य में पड़ गये न, एक ऐसे समय में जिसमें मेरे भारत को छोड़कर कुछ भी महान शेष नहीं है, महाकाव्य आखिर लिखा किसपर जा रहा है? फिलहाल अपना हाथ तो आजकल महाकाव्य क्या काव्य-पंक्ति में भी तंग है। खैर, इस सूनेपन के पतझड़ में मैं बसंत की प्रतीक्षा में हूँ। और, अभी यह लाइन लिखते-लिखते पत्नी ने गुजरते हुए इस लिखे का मजमून भाँप लिया है और कहा है कि तुम लेखक लोग भी अजीब सनकी होते हो, न लिखने पर दो पन्ने का निबन्ध लिख सकते हो, दस ठो लाइन की कविता नहीं लिख सकते?

फिलहाल मैं उसे क्या बताऊँ कि मुझे हुआ क्या है।

(ऊपर लिखी किसी भी बात की सत्यता के कितने भी प्रतिशत का मेरा क्या दुनिया जहान के किसी भी आदमी से कोई लेना देना नहीं है, फिर भी बुरामन्तु (मेरा कोडवर्ड 'बुरा मानने वाले लोग) बुरा मान सकने के लिए स्वतंत्र हैं)

रविवार, २९ जून २००८

बरात जाब जरूरी है

अवध के ग्रामीण अंचल में बारात जाना एक अद्वितीय अनुभव है..... जो न गया हो वह उसे जान नहीं सकता, कहें तो यह एक अविगत अनुभव है; फिर भी अवधी के एक अनाम कवि की यह बानगी प्रस्तुत है।

बरात जाब जरूरी है

बुधई के लड़िका कै ब्याह रहा
हमरे जियरा मा चाह रहा
दस बीस रहे संग साथ मा
तब हमहूँ चले बारात मा
जब बीत गयी आधी रात
तब गाँव मा पहुँची बरात
बुधई भैया न देर किहिन
पहुँचतै गोला दगवाय दिहिन
कुकुरवे पहिले स्वागत किहिन
दौड के गोड़वा मा काट लिहिन
गाँव वाले सब गये डेराय
लाठी लै-लै सब गये आय
वे जानिन डाकू गये आय
चारिंउ ओर से लिहिन घेराय
पहचान मिला तब हाथ मिला
फिर सबसे जाय बरात मिला
समधी-समधी में भवा बवाल
अब दुआरे कै सुना हाल
जब होय लाग दुआरे कय चार
र्इंटा, ढेला कै भवा बौछार
केहुक मुँह टूट केहुक हाथ टूट
चिल्लाये भैया मूड़ फूट
भागेन हमहूँ और मुसरीदीन
खूँटा से गोड़वा तूर लिहिन
तब हम भागेन घरा सेवान
हमहूँ और मुसरीदीन
ब्याह के कारण जिउ दै दीन
प्रदीप कहिन मजबूरी है
बरात जाब जरूरी है।

बुधवार, ९ अप्रैल २००८

चुरा के मेरी पोस्ट कहां तुम चले

मेरी पोस्ट वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़ हूबहू शशि भाई ने अपने ब्लाग पर डाल दी है। उन्होंने कर्टसी में मेरा नाम भी नहीं दिया। बहुत आहत महसूस कर रहा हूं।
शशि भूषण जी बेहद प्रतिभाशाली कथाकार हैं व्यक्तिगत रूप से उनकी कहानियों का मैं बड़ा प्रशंसक हूं। पता नहीं उन्होंने यह क्यों किया। शब्द दर शब्द पोस्ट एक जैसी है। मैंने 17 अगस्त 2007 को यह पोस्ट लिखी थी .. उनके ब्लाग पर यह 23 सितम्बर 2007 की तारीख में है। अब आप सब ही न्याय करें ....


मेरी पोस्ट
http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post.html

शशि जी की पोस्ट
http://kathavartashashi.blogspot.com/2007/09/blog-post_4764.html

गुरुवार, १३ मार्च २००८

एट एण्ड ए हाफ : कलात्मक क्राइसिस के बीच काँपते हुए स्वप्न

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

आज बड़े दिनों बाद कुछ फुर्सत निकली तो फेडेरिको फेलिनी की फिल्म 'एट एण्ड ए हाफ' देखी। इस फिल्म को वर्ष 1963 में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म का एकेडमी एवार्ड मिला था। फेलिनी इतालवी सिनेमा की बेहद चर्चित शख्सियत रहे हैं। 'एट एण्ड ए हाफ' का नाम पहले था 'ला बेला कन्फ्यूजियोन' मतलब 'द ब्यूटीफुल कन्फ्यूज़न'। फेलिनी की शख्सियत को ध्यान में रखते हुए तो यही नाम ज्यादा ठीक था। यह फिल्म फिल्म मेकिंग के बारे में है, नायक गुइदो एक निर्देशक है और उसे लगता है कि उसके आस पास की दुनिया ठीक उसकी रचनात्मकता की ही तरह डूब रही है। यह फिल्म कहानी कहने की कला में समय के एक द्रव की तरह के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण है।

फिल्म की शुरुआत में गुइदो एक कार में ट्रैफिक जाम में फंसा हुआ है उसकी कार के शीशे बन्द हैं और कार में धुँआ भर गया है, उसकी साँस घुट रही है और वह अचानक कार की छत से ऊपर आसमान में उड़ जाता है। थोड़ी ही देर बाद दो आदमी दिखते हैं, जिनमें से एक के हाथ में एक रस्सी है जिसका एक सिरा गुइदो के पैर में बंधा हुआ है, जिसके माध्यम से वह उसे खींच कर उतार लेता है। यह एक प्रतीक है कि एक रचनात्मक आदमी के जीवन में दुनियावी चीज़ों का असहनीय धुंआ हमेशा भरा रहता है जिससे वह कितना भी भागना चाहे उसे वापस आना ही होता है।

गुइदो का प्रोडयूसर उसके एक ऐसे आइडिया के पीछे काफी पैसा लगा चुका है, जिसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता है यहाँ तक कि गुइदो को भी। दरअसल वह अपनी जिन्दगी की जटिलताओं को ही फिल्माना चाहता है, उसका इरादा एक परम्परागत फिल्म बनाने की बजाय एक फ्रैग्मेण्टेड फिल्म बनाने का है। गुइदो के लिए सपने ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वे सपने जो उसकी रोजमर्रा की ज़िन्दगी से निकल आते हैं। नायिकाएँ उसके पीछे पड़ी हैं कि वह उन्हें उनके रोल के बारे में बताए, लेकिन गुइदो अपनी फैंटेसीज में मग्न है। गुइदो का बचपन कैथोलिक माहौल में बीता है और विचारधारा के स्तर पर वह माक्र्सवादी है। उसकी एक ही मनोवृत्ति जो पूरी फिल्म में उभरकर सामने आती है - वह है प्रोटोगैनिज्म। फिल्म के मध्य में उसकी पत्नी लुईसा व्यथित होकर उससे कहती है कि तुम पूरी तरह से एक झूठ हो, तुम्हें सिर्फ एक बात पसन्द है और वह है पूरी दुनिया को यह दिखाना कि तुम कितने आश्चर्यजनक हो। गुइदो की बहुत सारी फैन्टेसीज़ हैं, पैसा देकर डेविल कही जाने वाली महिला सारागीना का नृत्य देखना, 'आसा निसी मासा' के चैण्ट से डरना, अपने मृत माता पिता से बात करना और ऐसी बहुत सारी चीज़ें। सबसे महत्वपूर्ण फैन्टेसी है - एक हरम की कल्पना जहाँ उसकी ज़िन्दगी में कभी न कभी आई हुई सभी औरतें हैं, यहाँ तक कि वे औरतें भी जिन्हें सिर्फ गुइदो ने देखा है और उनके साथ कभी होने की कल्पना की है, वह खुद को उनके मालिक की तरह देखता है, ताज्जुब की बात है कि उसकी पत्नी लुइसा इस हरम में एक हाउसकीपर की तरह है। पहले पहले देखने पर ये फैन्टेसीज़ एक लिबिडो का परिणाम लगती हैं, लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। हम पाते हैं कि गुइदो एक ऐसे चरित्र के रूप में है जो संसार को एक छोटे बच्चे की दृष्टि से देखता है और इसीलिये उसकी दुनिया में इतने सारे अलग-अलग संसारों के सपने हैं। फिल्म के अंत में उसकी अन्तिम फैंटेसी के रूप में भी हम देखते हैं उसकी दुनिया में शामिल सभी लोग एक सर्कस की आकृति में उसके साथ हैं और वह उन सबको फिल्म के एक सीन की तरह निर्देशत कर रहा है, और उसका बचपन का रूप सामने ट्रम्पेट बजा रहा है।
इस फिल्म में बहुत सारे प्रभाव एक साथ हैं पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक रचनात्मक जीनियस को किस तरह पूरी दुनिया समझने में असफल रहती है। गुइदो अपने जीवन की सारी औरतों को जिनमें कुमारियाँ भी हैं, प्रेमिकाएँ भी हैं पत्नी भी है, उसकी माँ भी है .. बेहद प्यार भी करता है और नफरत भी करता है पर वह उन सबके प्रति एक तरह का ईमानदार व्यक्तित्व है। वह एक निर्दोष बच्चे की तरह है और उसके आस-पास की दुनिया समझदार, परिपक्व और चालबाज बन गई है, फिर भी वह उन चालबाज और तथाकथित परिपक्व लोगों को इतना प्यार करता है कि वे उसकी फैंटेसीज का हिस्सा है। दुनिया के पास उसके लिए अनगिनत सवाल हैं, लेकिन उसके पास इनमें से किसी का भी जवाब नहीं है।

फिल्म में नायक के साथ रहने वाला फिल्म क्रिटिक हमेशा लम्बे लम्बे दार्शनिक और सैध्दान्तिक वक्तव्य बघारा करता है, जिनसे नायक ऊबता रहता है, लेकिन अन्त में फेलिनी ने उससे एक रिमार्केबल बात कहलवाई है कि ''कभी कभी नष्ट करना रचना करने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।''

रविवार, ९ मार्च २००८

प्रकाश

प्रकाश

हमें चाहिए धूप
कि हम पढ़ सकें जीर्ण पन्नों को
सुधार सकें नये लिखे के हिज्जे

हमने बोई है आसमानी खेत पर
उजाले की कुँवारी हरी दूब
हमारा रक्त पहले से है वातावरण में
देखा है हमने आकाश के आईने में
अपने पीले चेहरों का अक्स
हम पोंछते हैं नारंगी सूरज पर जमी गर्द
इस तरह हमने आकाश को दिया है
हर ज़रूरी सामान
कि वह बना सके उजाला

हम एक पुराने लोहे जैसे
काले दिन के नागरिक हैं
हमें थोड़ा प्रकाश चाहिए