यह एक अजीब सूनेपन का समय है। सच कहूँ तो बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा न ब्लॉग पर और न कागज पर। शायद ध्यान दूँ तो कॉलेज के रोजनामचे और चेक बुक्स के अलावा दस्तखत भी कहीं नहीं किये। इतना सूनापन तो कभी नहीं था। कुछ कुछ जीवन बचपन की गर्मियों की दोपहर जैसा हो गया है, जब हमारे पास कोई काम नहीं होता था और माँ पूरे यत्न में रहती थीं कि कैसे इसे सुला दिया जाये और लगभग-लगभग सफल भी हो जाती थीं। कभी लगता है कि ऐसी ही किसी स्थिति में निराला जी ने 'पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है' जैसा कुछ लिखा होगा। खैर वे निराला थे और जितना यह सच है उतना ही यह भी कि हम निराला नहीं हैं। इधर इस अलेखन ने कई सम्बन्ध भी खराब कर दिये हैं। कई एसाइनमेंट्स थे, जो अब कालातीत हो गये हैं। वैसे भी मैं खुद को एक धीमा लेखक मानता हूँ और इधर तो यह धीमापन एक भयंकर स्थगन में बदल गया है।
अच्छा एक बात और भी है, पढ़ इधर खूब रहा हूँ, फिल्में खूब देख रहा हूँ और खूब संगीत सुन रहा हूँ। और कभी कभी ऐसा करते हुए लगता है कि शायद समाज को ऐसे लोगों की आज ज्यादा जरूरत है। इतना कुछ और इतनी ज्यादा मात्रा में सृजित हो रहा है हमारे चारों ओर, कोई इसे नोटिस करने वाला भी तो होना चाहिए। यह जरूर है कि इस स्थगित होकर पढ़ने की प्रक्रिया में बहुत सारा कुछ ऐसा भी मिला जिसे पढ़ने का मन नहीं किया, लेकिन बहुत कुछ अच्छा भी मिला। मेरे एक वरिष्ठ कवि मित्र हैं, जिन्हें हम प्यार से भूतपूर्व कवि कहते हैं। मैं उनकी बात का आदर करते हुए यह कोट करना चाहता हूँ कि वे कभी कभी कहते हैं कि अब जब मैं कविता लिखने के बारे में सोचता हूँ तो मुझे उबकाई आती है। जब पहली बार मैंने उनके मुँह से ऐसा सुना तो मुझे बड़ा अजीब लगा लेकिन अपने इन दिनों में जब मैं उनकी बात को याद करता हूँ तो कुछ सोचने को विवश हो जाता हूँ कि आखिर किस मन:स्थिति में उन्होंने वह बात कही होगी। खैर अपना अपना स्थगन-काल है, उनका थोड़ा लम्बा हो गया, हो सकता है मेरा थोड़ा कम अवधि का हो और कल ही मैं इसी ब्लॉग पर एक कविता लिख मारूँ।
सुना है ने लेखकों ने न लिखने के कारणों पर भी विचार किया है। किशोरावस्था में पढ़ा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का 'क्या लिखूँ' टाइप कुछ याद आता है। पर यहाँ तो सामग्री की कमी नहीं है, रोज ही कोई न कोई विचार खलबली मचाता है, यहाँ बीमारी कुछ कुछ क्यों लिखूँ टाइप की है। आचार्य मम्मट ने लेखन के लिए प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास इन तीन चीज़ों की दरकार मानी थी। सोचूँ तो लगता है साला अपने पास तो इन तीनों का ही टोटा है। आज अगर मम्मट या दण्डी होते तो जरूर सबसे पहले मुझे ब्लैकलिस्टेड कर देते कि अबे! बिना रजिस्ट्रेशन के कविता लिख रहा है। खैर ब्लैकलिस्टेड तो वे वैसे भी मुझे कर देते कि ये सब जो तू कागद काला करता है दिन भर, ये कौन सी कविता है, जा हम तो नहीं मानते इसे कविता। बहिष्कार हो जाता मेरा तो। वैसे आज भी मम्मटों और दण्डियों की कमी नहीं है, जो यदा-कदा अपना दण्ड हम जैसे समकालीनी कवियों पर फिराते रहते हैं। एक मजेदार बात आपको बताता हूँ एक बार एक गरिष्ठ कवि (ये मेरा कोडवर्ड है, आपको इसके बारे में बाद में बताऊँगा) ने मुझसे प्यार से कहा कि देखो भाई बुरा मत मानो ये तुम लोग जो लिखते हो, यह सब बेकार है। कविता ऐसी होनी चाहिए जो जबान पर तुरन्त चढ़ जाये। तुरन्त उन्होंने उदाहरणार्थ की हेडिंग मारकर डैश लगाया और चार पाँच अहा! और कहा! ध्वनियों वाली कवितायें टेल दीं। मैं उस दिन अवज्ञा के मोड (ध्यान रखिए मूड नहीं मोड) में था और मैंने कहा - गुरू जी जबान पर चढ़ने की दृष्टि से देखा जाए तो दुनिया का श्रेष्ठतम साहित्य गालियाँ हैं, क्योंकि वे हर किसी की जबान पर चढ़ी रहती हैं। कहना न होगा कि मैंने उनकी शाम-वाम, पान-वान और आन-बान तीनों का मज़ा उस दिन एकसाथ खराब किया। खैर, हम कवि हैं, और बहुतों की नजर में उद्दण्ड कवि हैं, इसलिए ऐसी बातों का होना लाज़िमी है।
फिलहाल मूल समस्या पर आते हैं, न लिखने की समस्या पर। मैंने पाया है कि न लिखने के पीछे एक और बड़ा कारण है कि आप पर कुछ कालजयी टाइप लिखने का फितूर सवार हो जाता है और उस चक्कर में आप कुछ भी लिखने से परहेज करते हैं। आज भी मुझे कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं जो महाकाव्य लिख रहे हैे। आश्चर्य में पड़ गये न, एक ऐसे समय में जिसमें मेरे भारत को छोड़कर कुछ भी महान शेष नहीं है, महाकाव्य आखिर लिखा किसपर जा रहा है? फिलहाल अपना हाथ तो आजकल महाकाव्य क्या काव्य-पंक्ति में भी तंग है। खैर, इस सूनेपन के पतझड़ में मैं बसंत की प्रतीक्षा में हूँ। और, अभी यह लाइन लिखते-लिखते पत्नी ने गुजरते हुए इस लिखे का मजमून भाँप लिया है और कहा है कि तुम लेखक लोग भी अजीब सनकी होते हो, न लिखने पर दो पन्ने का निबन्ध लिख सकते हो, दस ठो लाइन की कविता नहीं लिख सकते?
फिलहाल मैं उसे क्या बताऊँ कि मुझे हुआ क्या है।
(ऊपर लिखी किसी भी बात की सत्यता के कितने भी प्रतिशत का मेरा क्या दुनिया जहान के किसी भी आदमी से कोई लेना देना नहीं है, फिर भी बुरामन्तु (मेरा कोडवर्ड 'बुरा मानने वाले लोग) बुरा मान सकने के लिए स्वतंत्र हैं)