सोमवार, 17 जनवरी 2011

लेट्स मेक इट ए क्विकी ...

(प्रणव मुखोपाध्याय अयोध्या-फैजाबाद में कुछ नौजवानों द्वारा बेहद सीमित संसाधनों में किये जा रहे फिल्म फेस्टिवल के समापन पर आये थे। इस अवसर पर उन्होंने अपनी एकल प्रस्तुति पेश की। यह सच है कि प्रदर्शनकारी कलाओं, जैसे चित्रकला, संगीत और रंगमंच का प्रभाव साहित्य से त्वरित होता है और उनकी पहुँच भी थोड़ी ज़्यादा होती है, पर यह आश्चर्यजनक है कि जहाँ हिन्दी साहित्य में अब प्रतिबद्धता से आँख चुराने और शिल्प के प्रयोग की छटपटाहट अधिक है वहीं इस ‘आल्टरनेटिव थियेटर’ में शिल्प तो एकदम नया है ही ग्रासरूट कमिटमेंट भी है।)



23 दिसम्बर को फै़ज़ाबाद में अपने सोलो एक्ट में जो कुछ प्रणव मुखोपाध्याय ने सम्प्रेषित किया उसे लिख पाना बहुत सम्भव नहीं है। इस बात को मैं एक दूसरे तरीके से भी कहना चाहूँगा कि प्रणव ने अपनी दमदार प्रस्तुति से जो बात लोगों तक प्रभावशाली तरीके से पहुँचाई वह बात सैकड़ों भाषणों, लेखों और कविताओं से पहुँचाई नहीं जा सकती है। इसे आप मुझपर तात्कालिक रंगमंचीय प्रभाव का अतिरेक भी कह सकते हैं लेकिन यक़ीन मानिये प्रणव की रैण्डम स्क्रिप्ट का एक-एक संवाद और एडिशनल टेक्स्ट की तरह प्रयुक्त उदयप्रकाश व पाश की कविताएँ कुछ इस तरह कानों मंे फुसफुसा रही थीं जैसे हम खुद से वह कह रहे हों, जो हम कहना तो चाहते हैं पर कभी कह नहीं पाते।

वैकल्पिक रंगमंच भारत में एक विरल विधा है। इसके अपने खतरे हैं, क्योंकि शुद्धतावादियों या परम्परावादियों के लिए तो यह एक विकृति जैसा है ही, कई बार यह भी बहुत सम्भव होता है कि विद्वान समीक्षक या प्रबुद्ध दर्शक भी इसके प्रयोगों को खारिज़ करने में कोताही नहीं करते। प्रणव मुखोपाध्याय वैकल्पिक रंगमंच की चर्चित शख्सियत हैं। पूर्व में पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर चुके प्रणव स्वतंत्र मीडिया विश्लेषक और प्रस्तुति सलाहकार के रूप में कार्य करने के साथ-साथ सम्प्रति वियतनाम में एमनेस्टी इंटरनेशनल के फेलो हैं। वे देश विदेश में वैकल्पिक रंगमंच की लगभग 50 से अधिक प्रस्तुतियाँ कर चुके हैं। मुख्यतः मणिपुर व उत्तरपूर्व के प्रतिरोध के रंगमंच से सम्बद्ध प्रणव राजनैतिक रूप से पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं लेकिन उनकी यह प्रतिबद्धता वाम संगठनों सहित किसी भी पार्टीलाइन के दायरे में नहीं आती।

उनकी यह प्रस्तुति नेक्रोपोलिस (मुर्दों का शहर) शीर्षक से थी। वे दो अनाम जगहों के दो अनाम व्यक्तियों के बीच हो रही एक डील से अपना फ्रेम शुरू करते हैं। एक खरीदने वाला है और एक बेचने वाला। बेचने वाला आदमी आधुनिक प्रगतिशील बौद्धिक मुखौटे में एक फासिस्ट है, जिसे प्रणव ने सेक्युलर माफिया की संज्ञा दी है। वह धीरे धीरे चार चीज़ें बेचता है, खामोशी, प्रतिरोध, विचार और सपने (चार पर एक मुफ्त वाले ग्लोबल मुहावरे के साथ पाँचवी चीज़ है-मृत्यु)। दोनों के बीच के संवाद एक लिज़लिज़े मसखरेपन के साथ आगे बढ़ते हैं। बेचने वाला आदमी खुद को सेमिनार टूरिस्ट और फेलोशिप पर जीने वाला बताता है जो शौकिया रंगमंच भी करता है। पाश्र्व में प्रोजेक्टर पर मणिपुर में सशस्त्र सेनाओं द्वारा एएफएसपीए के दुरुपयोग के वीडियोज़ चल रहे हैं। प्रणव न सिर्फ पूरी व्यवस्था पर व्यंग्य करते हैं बल्कि व्यवस्था विरोध के नकलीपन को भी वे उजागर करते हैं। वे बताते हैं किस तरह यह निर्धारित किया जाता है कि प्रतिरोध की मात्रा कितनी होगी। एन.जी.ओ. और धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं की मशरूमिंग भी उनके निशाने पर है।

वे बिल्कुल ताज़ा और समकालीन सवाल उठाते हैं - एम.फिल., पी-एच.डी.: 750 पेज़ की थीसिस, 5 आदमी नहीं पढ़ते? मणिपुर में रंगकर्मी आत्मदाह करता है, उसके छियानबे प्रतिशत जलने के बाद उसको शूट करने वाला कैमरामैन 7 महीने से गायब है, किसी अख़बार/पत्रिका में कोई खबर नहीं? देश के शैक्षिक परिदृश्य की रिपोर्ट्स में उत्तरपूर्व को कोई जगह नहीं? क्यों दिल्ली आज भी गौहाटी के युवाओं का न्यूयाॅर्क है? कुछ ऐसे ही सवाल हैं।

प्रणव के लिए केवल रंगमंच ही वैकल्पिक नहीं हैं, वे हर जगह विकल्प को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करते हैं, जैसे क्लासिक कृतियों के मूल कथ्य की बजाय उसके सबटेक्स्ट या ट्रांसक्रियेशन का प्रयोग जो वे कुमारसंभव जैसी शास्त्रीय कृतियों के मंचन के समय करते हैं। प्रणव एक बात और कहते हैं कि वे विचार या विचारधारा की बजाय उसके क्लीशेज़ को प्रयोग करते हैं क्योंकि परफार्मिंग आर्ट के रूपक में आप किसी को उपदेश देकर प्रभावित नहीं कर सकते। यह उनकी विधा की एक महीन ही सही लेकिन महत्वपूर्ण अण्डरलाइन है। एक और बात जिसने मुझे प्रभावित किया वह यह कि प्रस्तुति के दौरान प्रणव अभिनय के नाम पर ड्रैमेटिक एक्सप्रेशन्स का इस्तेमाल नहीं करते, कई बार यह इतना सहज होता है कि आपको लगेगा कि वे एक एमेच्योर हैं, पर यह सामान्यता ही उनकी विधा की विशेषता है।

नेक्रोपोलिस की प्रस्तुति के दौरान बेहद मामूली सेट प्रापर्टीज़ की मदद से वे कुछ बड़े बिम्ब रचने का प्रयास करते हैं। मसलन काले सफेद कपड़ों के अलग अलग प्रयोगों के माध्यम से उनका तकनीक और उससे उपजे विस्थापन, बाजारीकरण, वैश्विक कार्पोरेट्स द्वारा स्थानीयता के इस्तेमाल और शोषण, मानवाधिकार की समस्या, नरसंहार और सबसे बढ़कर बौद्विक वर्ग की अघायी हुई चुप्पी (इसके दौरान वे कपड़े का बड़ा सा गोला बनाकर मुँह में भर लेते हैं और शान्त खड़े हो जाते हैं) जैसी इमेजेस का रचना रोमांचित कर देता है।

इस प्रस्तुति का हिट प्वाइंट है प्रणव द्वारा अपने झोले से गांधी के तीन बन्दरों के सेट का निकालना जिसका आखिरी बन्दर अपनी जगह से हट गया है, प्रणव अलग-अलग तरीके से उस बन्दर को वहाँ बिठाने का प्रयास करते हैं और अंततः असफल होकर वे अपना पंजा वहाँ फिट कर देते हैं। मूक अभिनय से, बिना किसी संवाद की मदद के एक उदात्त विचार के राजनैतिक स्खलन का इतना दमदार बिम्ब मैंने पहले नहीं देखा।

किसी भी रंगमंच विधा को देखते हुए यह विचार आना स्वाभाविक है कि ये दृश्यमान स्मृतियाँ क्या काम करती हैं, क्या ये कही जाने वाली बात की पूरक हैं या बातें इन स्मृतियों को पूरा करती हैं। प्रणव की प्रस्तुति को देखते हुए ये बातें और अधिक गहराई से सामने आती हैं। यदि हम इम्प्रोवाइजेशन को एक रंगमंचीय अभ्यास की तरह भी देखें तो यह प्रस्तुति स्पष्ट दृश्य और शब्द के सम्बन्धों को और अधिक स्पष्ट करती है। यहाँ एक बात विचारणीय है कि क्या वैकल्पिक रंगमंच को अभिव्यक्ति व संवाद की एक शंृखला के रूपक के रूप में देखना ठीक होगा या हमें उन प्रत्ययोें की ओर भी देखना चाहिए जो इस प्रस्तुति के बाद उभर कर आते हैं।

अंततः, प्रस्तुति के मूल फ्रेम के खरीददार और बेचने वाले की बातचीत का प्रारम्भिक संवाद, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम क्या हैं, क्या हम सब कुछ बेचने या सब कुछ खरीदने की मनःस्थिति की तैयारी में हैं, क्या हम वैश्विक बाज़ार की पारदर्शी खिड़कियों में सजे उत्पाद हैं या विंडो शापिंग को निकले हैं - ‘‘टेल मी व्हाॅट यू हैव टू आॅफर फार सेल, लेट्स फिनिश इट फास्ट एण्ड गो बैक टू होम ... लेट्स मेक इट ए क्विकी’’।

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

अमरीका मेरी जान!



(युवा कहानीकार हरिओम के कहानी-संग्रह ‘अमरीका मेरी जान’ की यह समीक्षा मित्र अनुराग मिश्र ने की है। अनुराग मिश्र, हिन्दी के प्राध्यापक हैं और आलोचना की अच्छी समझ रखते हैं। समाजशास्त्रीय और उत्तर-आधुनिक विमर्श उनकी विशेषज्ञता है। वे इधर एक लम्बे अंतराल के बाद प्रकट हुए हैं। ‘हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी: एक उत्तर आधुनिक खेल’ काफी पहले का उनका चर्चित लेख है। मैं इस उम्मीद के साथ यहाँ उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूँ कि उनकी उपस्थिति अब बराबर बनी रहेगी।)



युवा कथाकार हरिओम के पहले कहानी-संग्रह 'अमरीका मेरी जान' को पढ़ना, इस संग्रह की ही एक कहानी से शब्द उधार लेकर कहा जाय तो, 'कहानी के देशकाल' से होकर गुज़रना है. ये महज़ देशकाल की कहानियाँ नहीं हैं जिनको समकालीन अनुभव के किसी पकड़ में आ सकने वाले स्थूल और इकहरे वर्गीकरण में घटाया जा सके. कहानी का देशकाल एक नैरन्तर्य में घटित होती वह प्रक्रिया है जो जीवन की स्थितियों में घटित होने वाले बदलावों के सामाजिक-राजनैतिक आग्रहों को नए सिरे से पहचानती है,उन्हें स्थान देना चाहती है तो दूसरी ओर यह उस स्थितिशीलता को भी रेखांकित करती है जो उसे कहीं किसी एक बिंदु पर स्थिर करना चाहती है. सामाजिक अनुभवों के विकास-क्रम ओर भाषिक संरचना की अपर्याप्तता को, उसके महत्वपूर्ण विचलनों को हम कहानी के देशकाल में ही समझ सकते हैं. राजनीति की विडम्बनाएँ,सत्ता का अवसरवादी चरित्र, सांप्रदायिक वैमनस्य,जातीय सामाजिक वास्तविकताएँ ओर ग्रामीण यथार्थ हिंदी कथा-संसार के वे परिचित विषय हैं जिन पर अद्भुत यथार्थ-दृष्टि के साथ ढेरों कहानियाँ लिखी गई हैं लेकिन कई बार वह हमारे बोध में एक ऐतिहासिक सच्चाई के रूप-मात्र में रह जाती है. परिवर्तन का यह संभवतः तीव्रतम समय है.

संग्रह की अंतिम कहानी 'अमरीका मेरी जान' समय में आये इन बदलावों की ओर संकेत करती है. यहाँ वास्तव में 'विश्व-आतंकवाद' के अचानक बने एक संस्करण की सावधान पड़ताल है जो साम्प्रदायिकता को परंपरागत दृष्टि से देखे जाने की अपर्याप्तता को उजागर करती है. भूमंडलीकरण का यह जो दौर हम देख रहे हैं,वह वास्तव में

केवल वस्तुओं या उत्पादों भर के लिए नहीं रह गया है, बल्कि सामुदायिक और स्थानीय-सी लगने वाली सामाजिक वास्तविकताएँ भी इसकी ज़द में आती दिख रही हैं. २६/११ की अमरीकी घटना के बाद देश का आम मुसलमान संदेह के घेरे में है, वह मुसलमान भी जो प्रेमचंद की कहानी में 'हमीद' था लेकिन हरिओम की कहानी में 'मोबीन', उतना ही निरीह, निश्छल और दुनियावी तौर पर अनजान!! यह एक नए प्रकार का भूमंडलीकरण है जो एक ओर विश्व-बाज़ार में ताक़तवर देश के विचारों को

ब्रांड-वैल्यू देता है तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर शक्तियों के गठजोड़ का एक नया आयाम विकसित करता है.दुर्भाग्य से हमारी राजनैतिक और बौद्धिक शक्तियाँ, सत्ता-विमर्श की अपनी चालाक कोशिश में इस अवसर पर विभाजित नज़र आती हैं. 'अमरीका मेरी जान' इस स्थिति की अपरिहार्य कारुणिकता को बहुत कारगर तरीके से व्यंजित करती है. जो एकध्रुवीय विश्व-व्यवस्था बनी है पिछले दशकों में, उसमें विचारों,मूल्यों,संस्कृति व फैशन के स्तर पर अमरीका का अनुगमन बढ़ा है. इसके जो भी अन्य प्रभाव रहे हों; एक खतरनाक सरलीकरण यह हुआ है कि अमरीकी-प्रतिरोध की बन रही नयी स्थितियों और तनावों को उसने हूबहू दूसरे देशों के स्थानीय सामाजिक संबंधों से समीकृत कर दिया है. आयात-अभ्यस्त विकासशील देशों के दूसरे छोर ने विह्वल-भाव से सब कुछ स्वीकार किया है. आधुनिक दौर में शीतयुद्ध की कूटनीति में जो सम्बन्ध ग्राह्य थे, वो अब अग्राह्य हैं. जिन राष्ट्रीयताओं और धार्मिक समाजों का अमरीका ने एक समय में सिर्फ इस्तेमाल किया था, अब उत्तर-आधुनिक बाज़ार के लिए वे सिरदर्द हैं और एक नयी चुनौती भी! अमरीका की सफलता यह है कि उसने अपनी श्रद्धापूर्ण-छवि के प्रभाव में इस चुनौती को विश्व-चुनौती बनाया है.

लेकिन हरिओम की कहानी में आये 'मोबीन'और उसके अब्बा आफ़ताब मियाँ जैसे साधारण लोग कैसे समझ सकते हैं अमरीका को जबकि उन्हें पता ही नहीं है अमरीका है कौन? कहानी के अंत में आता है ".......सिर्फ आफताब मियाँ एक बोरे पर कुछ सब्जियाँ रखे हुए आज भी यह सोचते हैं अमरीका कौन है और उनके बेटों से उसकी क्या दुश्मनी है."

एक कथाकार के रूप में हरिओम इसीलिए यथार्थ की केवल एक ही सतह को चित्रित करके नहीं रह जाते, वह उस दूसरी और फिर तीसरी सतह पर भी जाते हैं जिस पर जाना एक नए कथा-साहस की माँग करता है. उनकी कई कहानियों में मुसलमानों का सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन एक मद्धिम स्वर के रूप में लगातार आता दिखाई देता है. मद्धिम इसलिए कि इसे नारे व आन्दोलन के रूप में नहीं समझा जा सकता. 'आमकसम' और 'ये धुआं धुआं अँधेरा' कहानियों में हम इन आयामों को विकसित होते देख सकते हैं. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इन कहानियों में हरिओम अब तक की पारंपरिक कहानी की समझ से आगे बढ़ रहे होते हैं जिसके लिए मुसलमानों का चित्रण या तो साझा जीवन व सामाजिक समरसता को समझने के लिए है या फिर वह साम्प्रदायिकता के स्वरूप को समझाने के लिए एक अन्य पक्ष के चित्रण के रूप में. आज़ादी के बाद विकास का जो राष्ट्रीय खाका तैयार हुआ था, उसमें अल्पसंख्यकों का स्थान क्या था? क्या वह चुनावी-घोषणाओं और तुष्टिकरण की नीति से आगे बढ़ पाया? आधुनिकता की जिस थकान के बाद दलित और स्त्री-विमर्श हिंदी-क्षेत्र में उभरकर सामने आये हैं, उसी क्षेत्र में मुसलमानों का क्या हुआ? कहीं यह 'हाशिया' हमारे लिए अब भी असुविधाजनक तो नहीं? हरिओम ने इन प्रश्नों को बहुत सीधे तौर पर प्रश्न के रूप में तो नहीं उठाया है लेकिन बहुत दृढ़ता से यह रेखांकित किया है कि आर्थिक व सामाजिक विकास को और साम्प्रदायिकता को अलग-अलग शब्दबंधों में नहीं समझा जा सकता. यह महज़ संयोग नहीं है कि आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद को भी बड़े पैमाने पर मानव-संसाधन के रूप में अपना कच्चा माल दलित व पिछड़ी जातियों से ही मिलता है. इस पूरे परिदृश्य में रौशनी की एक लकीर अनीस,नसीम और जयराज जैसे चरित्रों की बुनावट में दिखाई देती है जिनका अस्तित्व अभी 'धुएं धुएं अँधेरे' के बीच है लेकिन समसामयिक स्थितियों में जो 'केवल जलती मशाल' हैं.

लोक-जीवन व भाषा की संपृक्तता हरिओम को कई बार कहानी में किस्सागोई और उसे कहने की एक रौमैन्टिक-दृष्टि भी देती है. इस रौमैन्टिक-दृष्टि को कथाकार ने वैयक्तिक सन्दर्भों व भावात्मक स्फीति में कमज़ोर नहीं किया है. इसका सर्जनात्मक उपयोग वह कभी गाँव (अवध) की संस्कृति के चित्रण और उसमें रहने वाले असाधारण चरित्रों को खड़ा करने के लिए करते हैं तो कभी उन चरित्रों की जीवन-दृष्टि को विकसित करने में जो प्रगतिशील और साझा विचारों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं. लबड्डा, जगधर,नसीम,रहमत,बन्ने जैसे चरित्रों के गठन में यदि एक तरफ वैचारिकता है तो दूसरी तरफ एक गहरी भावुकता भी. गाँव की ज़िन्दगी में देखें तो लबड्डा जैसे चरित्र वर्तमान ग्रामीण-संरचना में अपनी अर्थहीन उपस्थिति के कारण बेहद अनुपयोगी चरित्र हैं जिन्हें न तो पारंपरिक कथा-दृष्टि खड़ा कर सकती है और न ही स्त्री-विमर्श की आधुनिक कथा-दृष्टि. हरिओम के कथा-संसार में इनकी उपस्थिति अर्थ और बोध के कुछ दूसरे स्तरों की पहचान कराती है. इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि समकालीन कहानी-लेखन ने अनुभव व यथार्थ के नए संस्तरों को पहचानते हुए भी कहानी में चरित्रों के गठन को एक विगतकालिक व असंभव विचार मान लिया है.

'अमरीका मेरी जान' को पढ़ते हुए अनायास ही उसकी कथा-प्रविधि पर ध्यान जाता है. 'धीमापन'------अविश्वसनीय धीमापन हरिओम की कहानियों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है. एक पाठक के तौर पर हम उनकी कहानियों में लगातार उत्सुक होते हैं कि कहानी के विकास में अब कोई नाटकीय घटनाक्रम उपस्थित होने को है....लेकिन यह लगातार स्थगित होता जाता है. हरिओम एक बेहद तेज़ समय में उस विस्मृत ठहराव या धीमेपन को अपनी कथा-रणनीति का हिस्सा बनाते हैं जिसे सामयिक लेखन में कुछ अनुपयोगी मान लिया गया है. उनकी कहानियों में इसीलिए यह 'धीमापन' जहाँ एक ओर ऐतिहासिक व साहित्यिक-सांस्कृतिक स्मृतियों की लेखकीय पुनर्रचना करता है, तो दूसरी ओर यह उन मानवीय अनुभवों या स्थितियों का रेखांकन भी है जो हमारे राष्ट्रीय-जीवन की मुख्यधारा में अप्रासंगिक और हाशियाकृत हैं.

यह तथ्य थोडा अचरज में डालने वाला है कि एक कवि के तौर पर हरिओम की कविताओं में व्यवस्था और राजनीति की विडम्बनाओं को लेकर जहाँ एक ओर ललकारने वाली क्रांतिकारी मुद्रा है, वहीं कथा में यह अपने वर्णन में बेहद संयमित है. ऐसा नहीं है कि लेखक ने बाद में इन प्रश्नों से कोई दूरी बनाई हो बल्कि ये सारे सन्दर्भ कहानियों में और भी स्पष्ट हुए हैं, लेकिन इसके साथ ही एक दूसरी प्रवृत्ति को भी हम यहाँ महसूस कर सकते हैं और वह यह है कि माध्यम का परिवर्तन कई बार हमारी अनुभूति और वैचारिकता को नए ढंग से पुनर्संयोजित करता है ताकि उसे माध्यम की अपेक्षाओं के अनुरूप विश्वसनीय बनाया जा सके.

'अमरीका मेरी जान' की कहानियाँ हिंदी-कथा-लेखन में गतांक से आगे की कहानियाँ हैं जिसमे अनुभव-परंपरा का विस्तार भी है और नए अनुभवों का रेखांकन भी. अपनी संवेदना और भाषिक-सामर्थ्य दोनों ही दृष्टियों से ये कहानियाँ चकित करती हैं. वह पारंपरिक किस्सागोई और आधुनिक यथार्थ-दृष्टि दोनों को एक नए संतुलन में रखकर देखते हैं, इसीलिए विषयवस्तु या कथा की प्रस्तुति उनके यहाँ अस्वाभाविक संरचना में नहीं आती, बल्कि वह प्रायः एक ऐसी अप्रत्याशित अर्थ-सघनता के बीच विकसित होती है, जहाँ से हम उसे कुछ नई दिशाओं की ओर उन्मुख होता हुआ देख पाते हैं.

शुक्रवार, 17 सितम्बर 2010

पोस्ट जनसत्ता में प्रकाशित


पिछले दिनों अचानक भाई अविनाश वाचस्पति का सन्देश दिखा कि आपकी पोस्ट जनसत्ता में प्रकाशित हुई है


वाकई अच्छा लगा ... चीज़ें तो पहले भी छपती रही हैं पर ब्लॉग पर हलके फुल्के मूड में लिखी बात जनसत्ता में

छपी... मज़ा आ गया.. पर अगर अविनाश भाई न बताते तो शायद मुझे पता भी नहीं चलता .

आप सबके लिए यह कट्टिंग और मूल लिंक    http://nayasamay.blogspot.com/2008/11/blog-post.html

मंगलवार, 22 जून 2010

क्या आपने 'फिराक़' देखी है?




(यदि आप ब्रेख्त के शब्दों में 'अंधेरे समय का गीत' सुनना चाहते हैं तो यह फिल्म अवश्य देखें। 'रावण' और 'राजनीति' पर हो रही बहस के बीच हो सकता है मैं एक थोड़ा पुराने मुद्दे पर बात कर रहा हूँ लेकिन इस फ़िल्म में कुछ तो ऐसा है कि कविताओं पर पूर्वनियोजित अपनी शृंखला को बीच में ही रोककर मैं विवश हो गया हूँ कि इस फिल्म पर कुछ लिखूँ।)


फिराक़ के मानी होते हैं- अलगाव और तलाश। इस फ़िल्म की कथा में ये दोनों तत्तव पूरी तरह मौजूद हैं। गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित इस फ़िल्म को एक्टर-टर्न्ड-डायरेक्टर नंदिता दास ने दगों के आफ्टर-इफेक्ट्स पर केन्द्रित किया है। इस फ़िल्म में दंगे का एक भी दृश्य नहीं है। फिल्म का शिल्प कई छोटी छोटी कहानियों की बुनावट से बना है। नंदिता दास के अनुसार इतनी बड़ी परिघटना में वैयक्तिक रूप से नायकों और खलनायकों का चुनाव असंभव है, दंगों में बड़े या छोटे नुकसान की पहचान के बजाय मेरा उद्देश्य था कि अपने आस-पास लगातार उपजते जाते आतंक के अण्डरटोन्स को समझ पाने की जो उलझन मुझे दुनिया के हर इंसान के भीतर दिखाई देती है, मैं उसका कहीं रेखांकन कर सकूँ। इस दृष्टि से नंदिता का यह चुनाव मुझे ठीक लगा है क्योंकि दंगों और विभीषिकाओं पर बनने वाली गैरतटस्थ डाक्यूमेंट्रीज़या फिर मसाला एलिमेण्ट्स से भरी फिल्मों ने इस समझ का और अधिक नुकसान ही किया है।

कथा के नाम पर फिल्म में कुछ छोटी कहानियाँ हैं जो कि गुजरात की कई हज़ार कहानियों में से चुनी गयी हैं। एक भीरू गृहिणी, जिसने परिवार के भयवश शरण मांगती हुई एक स्त्री पर अपना दरवाज़ा बन्द कर दिया था, के कानों में हमेशा दरवाज़े की आवाज़ गूँजती रहती है। दो दोस्त (जिनमें से एक मुसलमान है) जो बदले वक्त में अपनी मित्रता के नये आयाम तलाश रहे हैं। एक मासूम बच्चा जो दंगों में अपना पूरा परिवार खो चुका है, और अपने अब्बू की तलाश में भटक रहा है। कुछ निम्नवर्गीय मुसलमान लड़के जो खुद पर हुए जुल्म के इंतक़ाम की असफल कोशिशें कर रहे हैं। और, एक मुस्लिम वृध्द संगीतज्ञ जो दंगों की हकीक़त से पूरी तरह नावाकिफ है, जिसे आज भी अपने संगीत पर पूरा भरोसा है (यद्यपि दंगों के बाद उसकी हफ्तावार बैठकों में आना लोगों ने बन्द कर दिया है), और जिसका भरोसा तब टूटता है जब उसे वली दकनी की मज़ार के टूटने का पता चलता है। इन सारी कहानियों के पात्रों में जो पीड़ा की एक मध्दिम तासीर निर्देशक द्वारा आरोपित है, वह अद्भुत है। पूरे दृश्यांकन का समय चौबीस घण्टों का है, जाहिर है इस वक्त में कुछ भी बदला नहीं, बदला जा भी नहीं सकता था, बदलने के किसी प्रयास की कोशिश दिखाना नंदिता का ध्येय भी नहीं था, पर एक बेचैनी, एक कसमसाहट और अपने भीतर की आवाज़ों और चीखों को महसूस हम ज़रूर कर सकते हैं।

नंदिता ने इस फिल्म को एक विरेचक अनुभव कहा है। मैं हिन्दू मुसलमान सम्प्रदायों के सम्बन्धों और उनकी टकराहट पर क्लीशे बन चुकी बातों में नहीं जाना चाहता पर इस फिल्म को देखते हुए एक महत्वपूर्ण बात आप महसूस करेंगे कि निम्नतम वर्ग से लेकर समाज के उच्च वर्ग तक हमारी समझ पर हमारे व्यक्तिगत भय और पूर्वग्रह इस हद तक हावी हैं, कि तटस्थता के अभिप्राय भी कहीं गुथे और उलझे हुए नज़र आते हैं। इस फिल्म के माध्यम से मैं किसी बड़े बदलाव या प्रभाव की उम्मीद न भी करूँ तो समाज के चिंतनशील वर्ग के माथे पर सोच की कुछ धारियाँ ज़रूर देखना चाहूँगा।

नसीर, दीप्ति नवल, रघुवीर यादव, संजय सूरी, शहाना गोस्वामी, टिस्का चोपड़ा और साथ ही अचरज और डर से भरे हुई ऑंखों वाले बच्चे 'मोहसिन' के रूप में मो. समद के अभिनय ने इस फिल्म की सान्द्रता को रेखांकित किया है। यह नंदिता दास की निर्देशक के रूप में पहली फिल्म है, और उन्होंने प्रयोगशील सिनेमा का एक नया गलियारा खोला है। आज जब नये सिनेमा के मुहावरे में बन रही फिल्मों में क्राफ्ट की बाजीगरी ज्यादा दिख रही है, नंदिता ने शिल्प और माध्यम-भाषा की ओर बहुत प्रयोग करने की बजाय विषय की नब्ज़ पकड़ने का काम किया है, जो मेरे विचार से अधिक गंभीर प्रयास है।

काइट्स, रावण और राजनीति जैसी वाहियात फिल्मों का मर्सिया पीटने की बजाय हमें ऐसी फिल्में देखने और सराहने की आदत डालने की बेहद ज़रूरत है!

मंगलवार, 8 जून 2010

शलभ श्रीराम सिंह की कवितायें

आज बहुत दिनों के बाद कोई पोस्ट लगा रहा हूँ। अब ऐसा क्यूँ हुआ इसके कारणों में गए बिना कुछ नया पोस्ट करना चाह रहा हूँ।
इधर मैने सोचा है कि अपने आस-पास (फैजाबाद और आस पास) के कुछ वरिष्ठ कवियों की कवितायेँ पढ़ी-पढाई जाएँ, तो आज शुरू कर रहा हूँ शलभ श्रीराम सिंह से .....
जिनका काव्य, जिनकी मित्रताएं, जिनका जीवन सब कुछ काफी चर्चित रहा है ...............


शलभ श्रीराम सिंह
जन्म: 05 नवंबर 1938 निधन: 22 अप्रैल 2000

काव्य-पाठ


खूब-खूब हुआ काव्य-पाठ
खूब-खूब सराहा गया एक दूसरे को जमकर
खूब-खूब जगा और जगाया गया आत्मबोध
श्रोता चुपचाप रहे कि शायद कहीं हों उनके भी शब्द
उनका भी कोई बिम्ब हो कहीं
कहीं कोई जानी- पहचानी लय उनकी हो अपनी
या फिर कोई बात
घर-घाट, बाजार-हाट, लूट-पाट भी
कुछ भी नहीं था कहीं केवल काव्य-पाठ

काव्य-पाठ केवल था कवियों की भाषा में
कवियों की बातचीत की तरह
यहाँ तक कि समय भी अनुपस्थित था
वहाँ
उनके बीच



शायद


ताज़ा-पकी रोटियों की महक
मेरे नथुनों के आस-पास मंडरा रही है
तुम्हें भूख लगी है शायद


ठंडे पानी का स्पर्श
मेरे गले को सींचता हुआ जान पड़ रहा है
तुम्हें प्यास लगी है शायद


बोझिल-बोझिल होती हुई
झपकने लगी हैं मेरी पलकें
तुम्हें नीद आ रही है शायद

बृहस्पतिवार, 13 नवम्बर 2008

आखिरी बार कब आपने अपने मन की सुनी थी?

आज यूँ कहीं पढ़ रहा था कि प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध अपनी मनःस्थिति का बेहद सम्मान करते थे। जाहिर है उनकी इन मनःस्थितियों में दो चीज+ें अवश्य थीं - बतियाना और चाय पीना। सुना है कि अपने ब्याह में वे सिर्फ इसलिए विलम्ब से पहुँचे कि नदी के किनारे किसी से बतियाने लगे थे और अपने छोटे भाई के विवाह में जाते हुए ट्रेन सिर्फ इसलिए छोड़ दी क्योंकि प्लेटफार्म पर वे इत्मीनान से चाय पीना चाहते थे। यह अलग बात है कि उस ट्रेन में उनका परिवार सवार था जो कई घण्टों तक इसके कारण परेशान हुआ।

यह सबकुछ मैं इसलिए दोहरा रहा हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि कम से कम अपनी मनःस्थिति का सम्मान करना आज के इस कठिन जीवन में हमारे लिए असम्भव सा होता जा रहा है। हम एक तरह से हमेशा हाँफते रहते हैं कमिटमेन्ट्स को पूरा करने के लिए, चाहे वे हमारे पेशे के हों या सम्बन्धों के। घड़ी के चौबीस घण्टे भी हमें कम पड़ते हैं इस भागदौड़ भरे जीवन को जीने के लिए। हम हमेशा समझौता करते हैं - अपना पसंदीदा गाना सुनना छोड़कर फोन सुनते हैं, शाम का घूमना छोड़कर लगातार काम निपटाते हैं। छुट्टियाँ (अगर वे कहीं हैं) मिलने पर भी हर पल आधे मन और आधे मस्तिष्क से अपने काम में डूबे रहते हैं। हम हर समय जवाबदेह रहते हैं और इसीलिए हम हमेशा कमर तोड़ते रहते हैं कि हमारे पास सही जवाब हों। हमारा यह समय ÷नो सर' सुनने का नहीं है और ÷यस सर!' यह दो शब्द कह पाने की स्थिति में होने के लिए हमें रोज अपने मन को कई-कई बार मारना पड़ता है। हम आकण्ठ काम में डूबे रहते हैं एक आरामदेह भविष्य की आशा के साथ।

आप खुद याद करें कि आखिरी बार कब आपने आँखें बन्द करके अपने घर में लेटकर एक धीमा रोमानी गाना बिना किसी व्यवधान के सुना था? आखिरी बार कब आपने अपनी चाय पूरे इत्मीनान के साथ सूर्यास्त को देखते हुए पी थी? कब आप बारिश में निःसंकोच भीगे थे बिना किसी डर के साथ? कब आपने एक पूरा क्रिकेट मैंच देखा था बॉल-टू-बॉल? कब आपने घर में डीवीडी पर एक बार में कोई फिल्म देखी थी? आखिरी बार कब आपने एक पूरा उपन्यास एक रीडिंग में खत्म किया था? आखिरी बार कब आप दोपहर में सोये थे और कोई नहीं था आपको जगाने वाला? आखिरी बार कब आपने अपने जीवन में आये हुए लोगों को सिर्फ याद करने के लिए याद किया था (बिना उनसे किसी काम के)? और आखिरी बार कब आपने अपनी खुशी के बारे में मतलब सिर्फ अपनी खुशी के बारे में सोचा था?

आखिरी बार कब आपने अपने मन की सुनी थी?

सोमवार, 20 अक्तूबर 2008

वेलकम टू सज्जनपुर या वेलकम टू बेनेगल्स ट्रैजेडी

कल श्याम बेनेगल के नाम पर इस फिल्म को देखना हुआ। फिल्म की शुरुआत और स्टोरीटेलिंग से लगा कि फिल्म अच्छी होगी। लेकिन ज्यों-ज्यों फिल्म आगे बढ़ती गई, मन बेहद निराश हुआ। कॉमेडी बनाने की कोशिश में फिल्म का कबाड़ा हो गया। वैसे कला का यह एक सामान्य सत्य है, कि एक कलाकार को प्रयोगवादी होना चाहिए लेकिन प्रयोग के चक्कर में आप अगर अपनी कलात्मकता की असली आत्मा से विचलित हों तो शायद यह ठीक नहीं होगा। वैसे फिल्म में उन सारे प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है जो समानान्तर सिनेमा और समानान्तर सोच को प्रदर्शित करते हैं। नुक्कड़ नाटक, नौटंकी और गीतों का लोकतांत्रिक व्यवस्था में विन्यस्त भ्रष्टाचार के प्रतिवाद में जैसा उपयोग किया गया है, वह दर्शाता है कि निर्देशक के मन में इस कॉमेडी के माध्यम से एक ऐसा सैटायर रचने की कोशिश रही है जो हल्के फुल्के ढंग से बात को कहते हुए लोगों को सोचने को मजबूर कर दे।
सबसे बड़ी चीज जो अखरती है वह है फिल्म में एक प्रभावशाली कथा का अभाव। जिस एक छोटी सी कथा के चारों ओर फिल्म का सारा ताना-बाना बुना गया है, वह प्रभाव नहीं छोड़ती और सच बात तो यह कि वह पूरी तौर पर यथार्थवादी कहानी भी नहीं है। यथार्थ के स्तर पर फिल्म में कई झोल हैं, जिनके कारण श्रेयस तलपड़े और अमृता राव के चरित्रों का पूरी तरह विकास नहीं हो पाया है। चिट्ठी लेखक का जो किरदार श्रेयस ने निभाया है, उसको ठीक तरह से शिल्पित करने में निर्देशक असमर्थ रहा है। जिन्होंने कभी गाँव में या शहर की कचहरी या तहसील वगैरह में असली चिट्ठी लेखकों/अर्जीनवीसों को देखा है उन्हें यह किरदार समूचे तौर पर अवास्तविक लगेगा। निर्देशक ने उत्तर प्रदेश के एक गॉंव सज्जनपुर की तस्वीर पेश करने की कोशिश की है और यह चाहा है कि दर्शक खुद को उस गॉंव या कस्बे से जुड़ा हुआ महसूस करें। परन्तु सच्चाई यह है कि निर्देशक ने श्रेयस और अमृता के किरदारों पर केन्द्रित होने के चक्कर में कस्बाई माहौल के अन्य चरित्रों के विकास पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है, जिसके कारण यशपाल, दिव्या दत्ता जैसे मंझे हुए कलाकारों का ठीक से उपयोग तक नहीे हो पाया है। श्रेयस और अमृता के बीच फिल्माये गये कई दृश्य दोहराये हुए और अनावश्यक लगते हैं। इसका एक कारण हाल की सफलताओं के कारण श्रेयस की बढ़ी हुई मार्केट वैल्यू भी हो सकती है, क्योंकि फिल्म के प्रमोशन में भी ये दोनों सितारे गाहे-बेगाहे नजर आते रहे। मध्यांतर के बाद रबर की तरह फिल्म खिंचती हुई नजर आती है और अन्त में एक अत्यन्त अवास्तविक दृश्य है, जब हिन्दी का प्रकाशक फिल्म के नायक को एक हाथ से उसके उपन्यास की प्रति सौंपता है और दूसरे हाथ से उसकी रॉयल्टी का चेक।
हो सकता है, यह आंकलन कुछ लोगों को अतिवादी लगे, लेकिन सच यह है कि जब आप श्याम बेनेगल की फिल्म देखते हैं तो उससे कुछ अधिक उम्मीदें रखते हैं। यह फिल्म कहीं से भी बेनेगल की फिल्म नहीं लगती। कॉमेडी बनाने के फेर में यह एक ट्रैजेडी बनकर रह गयी है। हालांकि मुझे लगता है कि गम्भीर फिल्म बनाने वालों के साथ अक्सर ऐसा होता है, अभी हाल में ही नाकेश कुकनूर ने बॉम्बे टू बैंकॉक नाम से एक ऐसा ही असफल प्रयास किया था।
फिलहाल व्यक्तिगत तौर पर मुझे श्याम बाबू से कुछ ज्यादा उम्मीदें थीं।