<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488</id><updated>2012-02-16T09:38:51.130-08:00</updated><category term='कविता'/><category term='चुरा के मेरी पोस्ट'/><category term='प्रकाशित'/><category term='क्लासिक फिल्मों के रीमेक'/><category term='रंगमंच'/><category term='चे ग्वेरा'/><category term='समीक्षा'/><category term='शलभ श्रीराम सिंह'/><category term='डायरी'/><category term='अवधी कविता'/><category term='मार्खेज़'/><category term='फिल्म'/><title type='text'>Naya Samay ......... A Hindi Literature Blog</title><subtitle type='html'>A Hindi Literature Blog</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>28</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-3313885373195811067</id><published>2011-01-17T19:30:00.000-08:00</published><updated>2011-01-17T19:33:08.996-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रंगमंच'/><title type='text'>लेट्स मेक इट ए क्विकी ...</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;strong&gt;(प्रणव मुखोपाध्याय अयोध्या-फैजाबाद में कुछ नौजवानों द्वारा बेहद सीमित संसाधनों में किये जा रहे फिल्म फेस्टिवल के समापन पर आये थे। इस अवसर पर उन्होंने अपनी एकल प्रस्तुति पेश की। यह सच है कि प्रदर्शनकारी कलाओं, जैसे चित्रकला, संगीत और रंगमंच का प्रभाव साहित्य से त्वरित होता है और उनकी पहुँच भी थोड़ी ज़्यादा होती है, पर यह आश्चर्यजनक है कि जहाँ हिन्दी साहित्य में अब प्रतिबद्धता से आँख चुराने और शिल्प के प्रयोग की छटपटाहट अधिक है वहीं इस ‘आल्टरनेटिव थियेटर’ में शिल्प तो एकदम नया है ही ग्रासरूट कमिटमेंट भी है।)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TTUJQIom1hI/AAAAAAAAAGQ/r_f1idF_9Po/s1600/pranab2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="238" n4="true" src="http://1.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TTUJQIom1hI/AAAAAAAAAGQ/r_f1idF_9Po/s320/pranab2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;23 दिसम्बर को फै़ज़ाबाद में अपने सोलो एक्ट में जो कुछ प्रणव मुखोपाध्याय ने सम्प्रेषित किया उसे लिख पाना बहुत सम्भव नहीं है। इस बात को मैं एक दूसरे तरीके से भी कहना चाहूँगा कि प्रणव ने अपनी दमदार प्रस्तुति से जो बात लोगों तक प्रभावशाली तरीके से पहुँचाई वह बात सैकड़ों भाषणों, लेखों और कविताओं से पहुँचाई नहीं जा सकती है। इसे आप मुझपर तात्कालिक रंगमंचीय प्रभाव का अतिरेक भी कह सकते हैं लेकिन यक़ीन मानिये प्रणव की रैण्डम स्क्रिप्ट का एक-एक संवाद और एडिशनल टेक्स्ट की तरह प्रयुक्त उदयप्रकाश व पाश की कविताएँ कुछ इस तरह कानों मंे फुसफुसा रही थीं जैसे हम खुद से वह कह रहे हों, जो हम कहना तो चाहते हैं पर कभी कह नहीं पाते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैकल्पिक रंगमंच भारत में एक विरल विधा है। इसके अपने खतरे हैं, क्योंकि शुद्धतावादियों या परम्परावादियों के लिए तो यह एक विकृति जैसा है ही, कई बार यह भी बहुत सम्भव होता है कि विद्वान समीक्षक या प्रबुद्ध दर्शक भी इसके प्रयोगों को खारिज़ करने में कोताही नहीं करते। प्रणव मुखोपाध्याय वैकल्पिक रंगमंच की चर्चित शख्सियत हैं। पूर्व में पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर चुके प्रणव स्वतंत्र मीडिया विश्लेषक और प्रस्तुति सलाहकार के रूप में कार्य करने के साथ-साथ सम्प्रति वियतनाम में एमनेस्टी इंटरनेशनल के फेलो हैं। वे देश विदेश में वैकल्पिक रंगमंच की लगभग 50 से अधिक प्रस्तुतियाँ कर चुके हैं। मुख्यतः मणिपुर व उत्तरपूर्व के प्रतिरोध के रंगमंच से सम्बद्ध प्रणव राजनैतिक रूप से पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं लेकिन उनकी यह प्रतिबद्धता वाम संगठनों सहित किसी भी पार्टीलाइन के दायरे में नहीं आती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी यह प्रस्तुति नेक्रोपोलिस (मुर्दों का शहर) शीर्षक से थी। वे दो अनाम जगहों के दो अनाम व्यक्तियों के बीच हो रही एक डील से अपना फ्रेम शुरू करते हैं। एक खरीदने वाला है और एक बेचने वाला। बेचने वाला आदमी आधुनिक प्रगतिशील बौद्धिक मुखौटे में एक फासिस्ट है, जिसे प्रणव ने सेक्युलर माफिया की संज्ञा दी है। वह धीरे धीरे चार चीज़ें बेचता है, खामोशी, प्रतिरोध, विचार और सपने (चार पर एक मुफ्त वाले ग्लोबल मुहावरे के साथ पाँचवी चीज़ है-मृत्यु)। दोनों के बीच के संवाद एक लिज़लिज़े मसखरेपन के साथ आगे बढ़ते हैं। बेचने वाला आदमी खुद को सेमिनार टूरिस्ट और फेलोशिप पर जीने वाला बताता है जो शौकिया रंगमंच भी करता है। पाश्र्व में प्रोजेक्टर पर मणिपुर में सशस्त्र सेनाओं द्वारा एएफएसपीए के दुरुपयोग के वीडियोज़ चल रहे हैं। प्रणव न सिर्फ पूरी व्यवस्था पर व्यंग्य करते हैं बल्कि व्यवस्था विरोध के नकलीपन को भी वे उजागर करते हैं। वे बताते हैं किस तरह यह निर्धारित किया जाता है कि प्रतिरोध की मात्रा कितनी होगी। एन.जी.ओ. और धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं की मशरूमिंग भी उनके निशाने पर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे बिल्कुल ताज़ा और समकालीन सवाल उठाते हैं - एम.फिल., पी-एच.डी.: 750 पेज़ की थीसिस, 5 आदमी नहीं पढ़ते? मणिपुर में रंगकर्मी आत्मदाह करता है, उसके छियानबे प्रतिशत जलने के बाद उसको शूट करने वाला कैमरामैन 7 महीने से गायब है, किसी अख़बार/पत्रिका में कोई खबर नहीं? देश के शैक्षिक परिदृश्य की रिपोर्ट्स में उत्तरपूर्व को कोई जगह नहीं? क्यों दिल्ली आज भी गौहाटी के युवाओं का न्यूयाॅर्क है? कुछ ऐसे ही सवाल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रणव के लिए केवल रंगमंच ही वैकल्पिक नहीं हैं, वे हर जगह विकल्प को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करते हैं, जैसे क्लासिक कृतियों के मूल कथ्य की बजाय उसके सबटेक्स्ट या ट्रांसक्रियेशन का प्रयोग जो वे कुमारसंभव जैसी शास्त्रीय कृतियों के मंचन के समय करते हैं। प्रणव एक बात और कहते हैं कि वे विचार या विचारधारा की बजाय उसके क्लीशेज़ को प्रयोग करते हैं क्योंकि परफार्मिंग आर्ट के रूपक में आप किसी को उपदेश देकर प्रभावित नहीं कर सकते। यह उनकी विधा की एक महीन ही सही लेकिन महत्वपूर्ण अण्डरलाइन है। एक और बात जिसने मुझे प्रभावित किया वह यह कि प्रस्तुति के दौरान प्रणव अभिनय के नाम पर ड्रैमेटिक एक्सप्रेशन्स का इस्तेमाल नहीं करते, कई बार यह इतना सहज होता है कि आपको लगेगा कि वे एक एमेच्योर हैं, पर यह सामान्यता ही उनकी विधा की विशेषता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेक्रोपोलिस की प्रस्तुति के दौरान बेहद मामूली सेट प्रापर्टीज़ की मदद से वे कुछ बड़े बिम्ब रचने का प्रयास करते हैं। मसलन काले सफेद कपड़ों के अलग अलग प्रयोगों के माध्यम से उनका तकनीक और उससे उपजे विस्थापन, बाजारीकरण, वैश्विक कार्पोरेट्स द्वारा स्थानीयता के इस्तेमाल और शोषण, मानवाधिकार की समस्या, नरसंहार और सबसे बढ़कर बौद्विक वर्ग की अघायी हुई चुप्पी (इसके दौरान वे कपड़े का बड़ा सा गोला बनाकर मुँह में भर लेते हैं और शान्त खड़े हो जाते हैं) जैसी इमेजेस का रचना रोमांचित कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रस्तुति का हिट प्वाइंट है प्रणव द्वारा अपने झोले से गांधी के तीन बन्दरों के सेट का निकालना जिसका आखिरी बन्दर अपनी जगह से हट गया है, प्रणव अलग-अलग तरीके से उस बन्दर को वहाँ बिठाने का प्रयास करते हैं और अंततः असफल होकर वे अपना पंजा वहाँ फिट कर देते हैं। मूक अभिनय से, बिना किसी संवाद की मदद के एक उदात्त विचार के राजनैतिक स्खलन का इतना दमदार बिम्ब मैंने पहले नहीं देखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी रंगमंच विधा को देखते हुए यह विचार आना स्वाभाविक है कि ये दृश्यमान स्मृतियाँ क्या काम करती हैं, क्या ये कही जाने वाली बात की पूरक हैं या बातें इन स्मृतियों को पूरा करती हैं। प्रणव की प्रस्तुति को देखते हुए ये बातें और अधिक गहराई से सामने आती हैं। यदि हम इम्प्रोवाइजेशन को एक रंगमंचीय अभ्यास की तरह भी देखें तो यह प्रस्तुति स्पष्ट दृश्य और शब्द के सम्बन्धों को और अधिक स्पष्ट करती है। यहाँ एक बात विचारणीय है कि क्या वैकल्पिक रंगमंच को अभिव्यक्ति व संवाद की एक शंृखला के रूपक के रूप में देखना ठीक होगा या हमें उन प्रत्ययोें की ओर भी देखना चाहिए जो इस प्रस्तुति के बाद उभर कर आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः, प्रस्तुति के मूल फ्रेम के खरीददार और बेचने वाले की बातचीत का प्रारम्भिक संवाद, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम क्या हैं, क्या हम सब कुछ बेचने या सब कुछ खरीदने की मनःस्थिति की तैयारी में हैं, क्या हम वैश्विक बाज़ार की पारदर्शी खिड़कियों में सजे उत्पाद हैं या विंडो शापिंग को निकले हैं - ‘‘टेल मी व्हाॅट यू हैव टू आॅफर फार सेल, लेट्स फिनिश इट फास्ट एण्ड गो बैक टू होम ... लेट्स मेक इट ए क्विकी’’।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-3313885373195811067?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/3313885373195811067/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=3313885373195811067' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3313885373195811067'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3313885373195811067'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='लेट्स मेक इट ए क्विकी ...'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TTUJQIom1hI/AAAAAAAAAGQ/r_f1idF_9Po/s72-c/pranab2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-8617015875354341067</id><published>2010-10-22T00:25:00.000-07:00</published><updated>2010-10-22T00:25:31.958-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समीक्षा'/><title type='text'>अमरीका मेरी जान!</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TME7_OWrLhI/AAAAAAAAAFo/jGJAHNMQPoE/s1600/america.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" nx="true" src="http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TME7_OWrLhI/AAAAAAAAAFo/jGJAHNMQPoE/s200/america.jpg" width="186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;em&gt;(युवा कहानीकार &lt;strong&gt;हरिओम &lt;/strong&gt;के कहानी-संग्रह ‘अमरीका मेरी जान’ की यह समीक्षा मित्र &lt;strong&gt;अनुराग मिश्र&lt;/strong&gt; ने की है। अनुराग मिश्र, हिन्दी के प्राध्यापक हैं और आलोचना की अच्छी समझ रखते हैं। समाजशास्त्रीय और उत्तर-आधुनिक विमर्श उनकी विशेषज्ञता है। वे इधर एक लम्बे अंतराल के बाद प्रकट हुए हैं। ‘हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी: एक उत्तर आधुनिक खेल’ काफी पहले का उनका चर्चित लेख है। मैं इस उम्मीद के साथ यहाँ उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूँ कि उनकी उपस्थिति अब बराबर बनी रहेगी।)&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;युवा कथाकार हरिओम के पहले कहानी-संग्रह 'अमरीका मेरी जान' को पढ़ना, इस संग्रह की ही एक कहानी से शब्द उधार लेकर कहा जाय तो, 'कहानी के देशकाल' से होकर गुज़रना है. ये महज़ देशकाल की कहानियाँ नहीं हैं जिनको समकालीन अनुभव के किसी पकड़ में आ सकने वाले स्थूल और इकहरे वर्गीकरण में घटाया जा सके. कहानी का देशकाल एक नैरन्तर्य में घटित होती वह प्रक्रिया है जो जीवन की स्थितियों में घटित होने वाले बदलावों के सामाजिक-राजनैतिक आग्रहों को नए सिरे से पहचानती है,उन्हें स्थान देना चाहती है तो दूसरी ओर यह उस स्थितिशीलता को भी रेखांकित करती है जो उसे कहीं किसी एक बिंदु पर स्थिर करना चाहती है. सामाजिक अनुभवों के विकास-क्रम ओर भाषिक संरचना की अपर्याप्तता को, उसके महत्वपूर्ण विचलनों को हम कहानी के देशकाल में ही समझ सकते हैं. राजनीति की विडम्बनाएँ,सत्ता का अवसरवादी चरित्र, सांप्रदायिक वैमनस्य,जातीय सामाजिक वास्तविकताएँ ओर ग्रामीण यथार्थ हिंदी कथा-संसार के वे परिचित विषय हैं जिन पर अद्भुत यथार्थ-दृष्टि के साथ ढेरों कहानियाँ लिखी गई हैं लेकिन कई बार वह हमारे बोध में एक ऐतिहासिक सच्चाई के रूप-मात्र में रह जाती है. परिवर्तन का यह संभवतः तीव्रतम समय है.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संग्रह की अंतिम कहानी 'अमरीका मेरी जान' समय में आये इन बदलावों की ओर संकेत करती है. यहाँ वास्तव में 'विश्व-आतंकवाद' के अचानक बने एक संस्करण की सावधान पड़ताल है जो साम्प्रदायिकता को परंपरागत दृष्टि से देखे जाने की अपर्याप्तता को उजागर करती है. भूमंडलीकरण का यह जो दौर हम देख रहे हैं,वह वास्तव में&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;केवल वस्तुओं या उत्पादों भर के लिए नहीं रह गया है, बल्कि सामुदायिक और स्थानीय-सी लगने वाली सामाजिक वास्तविकताएँ भी इसकी ज़द में आती दिख रही हैं. २६/११ की अमरीकी घटना के बाद देश का आम मुसलमान संदेह के घेरे में है, वह मुसलमान भी जो प्रेमचंद की कहानी में 'हमीद' था लेकिन हरिओम की कहानी में 'मोबीन', उतना ही निरीह, निश्छल और दुनियावी तौर पर अनजान!! यह एक नए प्रकार का भूमंडलीकरण है जो एक ओर विश्व-बाज़ार में ताक़तवर देश के विचारों को &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ब्रांड-वैल्यू देता है तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर शक्तियों के गठजोड़ का एक नया आयाम विकसित करता है.दुर्भाग्य से हमारी राजनैतिक और बौद्धिक शक्तियाँ, सत्ता-विमर्श की अपनी चालाक कोशिश में इस अवसर पर विभाजित नज़र आती हैं. 'अमरीका मेरी जान' इस स्थिति की अपरिहार्य कारुणिकता को बहुत कारगर तरीके से व्यंजित करती है. जो एकध्रुवीय विश्व-व्यवस्था बनी है पिछले दशकों में, उसमें विचारों,मूल्यों,संस्कृति व फैशन के स्तर पर अमरीका का अनुगमन बढ़ा है. इसके जो भी अन्य प्रभाव रहे हों; एक खतरनाक सरलीकरण यह हुआ है कि अमरीकी-प्रतिरोध की बन रही नयी स्थितियों और तनावों को उसने हूबहू दूसरे देशों के स्थानीय सामाजिक संबंधों से समीकृत कर दिया है. आयात-अभ्यस्त विकासशील देशों के दूसरे छोर ने विह्वल-भाव से सब कुछ स्वीकार किया है. आधुनिक दौर में शीतयुद्ध की कूटनीति में जो सम्बन्ध ग्राह्य थे, वो अब अग्राह्य हैं. जिन राष्ट्रीयताओं और धार्मिक समाजों का अमरीका ने एक समय में सिर्फ इस्तेमाल किया था, अब उत्तर-आधुनिक बाज़ार के लिए वे सिरदर्द हैं और एक नयी चुनौती भी! अमरीका की सफलता यह है कि उसने अपनी श्रद्धापूर्ण-छवि के प्रभाव में इस चुनौती को विश्व-चुनौती बनाया है.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लेकिन हरिओम की कहानी में आये 'मोबीन'और उसके अब्बा आफ़ताब मियाँ जैसे साधारण लोग कैसे समझ सकते हैं अमरीका को जबकि उन्हें पता ही नहीं है अमरीका है कौन? कहानी के अंत में आता है ".......सिर्फ आफताब मियाँ एक बोरे पर कुछ सब्जियाँ रखे हुए आज भी यह सोचते हैं अमरीका कौन है और उनके बेटों से उसकी क्या दुश्मनी है." &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक कथाकार के रूप में हरिओम इसीलिए यथार्थ की केवल एक ही सतह को चित्रित करके नहीं रह जाते, वह उस दूसरी और फिर तीसरी सतह पर भी जाते हैं जिस पर जाना एक नए कथा-साहस की माँग करता है. उनकी कई कहानियों में मुसलमानों का सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन एक मद्धिम स्वर के रूप में लगातार आता दिखाई देता है. मद्धिम इसलिए कि इसे नारे व आन्दोलन के रूप में नहीं समझा जा सकता. 'आमकसम' और 'ये धुआं धुआं अँधेरा' कहानियों में हम इन आयामों को विकसित होते देख सकते हैं. यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इन कहानियों में हरिओम अब तक की पारंपरिक कहानी की समझ से आगे बढ़ रहे होते हैं जिसके लिए मुसलमानों का चित्रण या तो साझा जीवन व सामाजिक समरसता को समझने के लिए है या फिर वह साम्प्रदायिकता के स्वरूप को समझाने के लिए एक अन्य पक्ष के चित्रण के रूप में. आज़ादी के बाद विकास का जो राष्ट्रीय खाका तैयार हुआ था, उसमें अल्पसंख्यकों का स्थान क्या था? क्या वह चुनावी-घोषणाओं और तुष्टिकरण की नीति से आगे बढ़ पाया? आधुनिकता की जिस थकान के बाद दलित और स्त्री-विमर्श हिंदी-क्षेत्र में उभरकर सामने आये हैं, उसी क्षेत्र में मुसलमानों का क्या हुआ? कहीं यह 'हाशिया' हमारे लिए अब भी असुविधाजनक तो नहीं? हरिओम ने इन प्रश्नों को बहुत सीधे तौर पर प्रश्न के रूप में तो नहीं उठाया है लेकिन बहुत दृढ़ता से यह रेखांकित किया है कि आर्थिक व सामाजिक विकास को और साम्प्रदायिकता को अलग-अलग शब्दबंधों में नहीं समझा जा सकता. यह महज़ संयोग नहीं है कि आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद को भी बड़े पैमाने पर मानव-संसाधन के रूप में अपना कच्चा माल दलित व पिछड़ी जातियों से ही मिलता है. इस पूरे परिदृश्य में रौशनी की एक लकीर अनीस,नसीम और जयराज जैसे चरित्रों की बुनावट में दिखाई देती है जिनका अस्तित्व अभी 'धुएं धुएं अँधेरे' के बीच है लेकिन समसामयिक स्थितियों में जो 'केवल जलती मशाल' हैं.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लोक-जीवन व भाषा की संपृक्तता हरिओम को कई बार कहानी में किस्सागोई और उसे कहने की एक रौमैन्टिक-दृष्टि भी देती है. इस रौमैन्टिक-दृष्टि को कथाकार ने वैयक्तिक सन्दर्भों व भावात्मक स्फीति में कमज़ोर नहीं किया है. इसका सर्जनात्मक उपयोग वह कभी गाँव (अवध) की संस्कृति के चित्रण और उसमें रहने वाले असाधारण चरित्रों को खड़ा करने के लिए करते हैं तो कभी उन चरित्रों की जीवन-दृष्टि को विकसित करने में जो प्रगतिशील और साझा विचारों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं. लबड्डा, जगधर,नसीम,रहमत,बन्ने जैसे चरित्रों के गठन में यदि एक तरफ वैचारिकता है तो दूसरी तरफ एक गहरी भावुकता भी. गाँव की ज़िन्दगी में देखें तो लबड्डा जैसे चरित्र वर्तमान ग्रामीण-संरचना में अपनी अर्थहीन उपस्थिति के कारण बेहद अनुपयोगी चरित्र हैं जिन्हें न तो पारंपरिक कथा-दृष्टि खड़ा कर सकती है और न ही स्त्री-विमर्श की आधुनिक कथा-दृष्टि. हरिओम के कथा-संसार में इनकी उपस्थिति अर्थ और बोध के कुछ दूसरे स्तरों की पहचान कराती है. इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि समकालीन कहानी-लेखन ने अनुभव व यथार्थ के नए संस्तरों को पहचानते हुए भी कहानी में चरित्रों के गठन को एक विगतकालिक व असंभव विचार मान लिया है.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'अमरीका मेरी जान' को पढ़ते हुए अनायास ही उसकी कथा-प्रविधि पर ध्यान जाता है. 'धीमापन'------अविश्वसनीय धीमापन हरिओम की कहानियों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है. एक पाठक के तौर पर हम उनकी कहानियों में लगातार उत्सुक होते हैं कि कहानी के विकास में अब कोई नाटकीय घटनाक्रम उपस्थित होने को है....लेकिन यह लगातार स्थगित होता जाता है. हरिओम एक बेहद तेज़ समय में उस विस्मृत ठहराव या धीमेपन को अपनी कथा-रणनीति का हिस्सा बनाते हैं जिसे सामयिक लेखन में कुछ अनुपयोगी मान लिया गया है. उनकी कहानियों में इसीलिए यह 'धीमापन' जहाँ एक ओर ऐतिहासिक व साहित्यिक-सांस्कृतिक स्मृतियों की लेखकीय पुनर्रचना करता है, तो दूसरी ओर यह उन मानवीय अनुभवों या स्थितियों का रेखांकन भी है जो हमारे राष्ट्रीय-जीवन की मुख्यधारा में अप्रासंगिक और हाशियाकृत हैं.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह तथ्य थोडा अचरज में डालने वाला है कि एक कवि के तौर पर हरिओम की कविताओं में व्यवस्था और राजनीति की विडम्बनाओं को लेकर जहाँ एक ओर ललकारने वाली क्रांतिकारी मुद्रा है, वहीं कथा में यह अपने वर्णन में बेहद संयमित है. ऐसा नहीं है कि लेखक ने बाद में इन प्रश्नों से कोई दूरी बनाई हो बल्कि ये सारे सन्दर्भ कहानियों में और भी स्पष्ट हुए हैं, लेकिन इसके साथ ही एक दूसरी प्रवृत्ति को भी हम यहाँ महसूस कर सकते हैं और वह यह है कि माध्यम का परिवर्तन कई बार हमारी अनुभूति और वैचारिकता को नए ढंग से पुनर्संयोजित करता है ताकि उसे माध्यम की अपेक्षाओं के अनुरूप विश्वसनीय बनाया जा सके.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'अमरीका मेरी जान' की कहानियाँ हिंदी-कथा-लेखन में गतांक से आगे की कहानियाँ हैं जिसमे अनुभव-परंपरा का विस्तार भी है और नए अनुभवों का रेखांकन भी. अपनी संवेदना और भाषिक-सामर्थ्य दोनों ही दृष्टियों से ये कहानियाँ चकित करती हैं. वह पारंपरिक किस्सागोई और आधुनिक यथार्थ-दृष्टि दोनों को एक नए संतुलन में रखकर देखते हैं, इसीलिए विषयवस्तु या कथा की प्रस्तुति उनके यहाँ अस्वाभाविक संरचना में नहीं आती, बल्कि वह प्रायः एक ऐसी अप्रत्याशित अर्थ-सघनता के बीच विकसित होती है, जहाँ से हम उसे कुछ नई दिशाओं की ओर उन्मुख होता हुआ देख पाते हैं. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-8617015875354341067?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/8617015875354341067/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=8617015875354341067' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/8617015875354341067'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/8617015875354341067'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='अमरीका मेरी जान!'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TME7_OWrLhI/AAAAAAAAAFo/jGJAHNMQPoE/s72-c/america.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-3535983248826262911</id><published>2010-09-17T06:34:00.000-07:00</published><updated>2010-09-17T06:38:47.433-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रकाशित'/><title type='text'>पोस्ट जनसत्ता में प्रकाशित</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TJNtkdnMhoI/AAAAAAAAAFc/0UlRjoeM5_E/s1600/mankibaat.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5517874441650734722" src="http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TJNtkdnMhoI/AAAAAAAAAFc/0UlRjoeM5_E/s200/mankibaat.jpg" style="cursor: hand; float: left; height: 232px; margin: 0px 10px 10px 0px; width: 178px;" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;पिछले दिनों अचानक भाई अविनाश वाचस्पति का सन्देश दिखा कि आपकी पोस्ट जनसत्ता में प्रकाशित हुई है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाकई अच्छा लगा ... चीज़ें तो पहले भी छपती रही हैं पर ब्लॉग पर हलके फुल्के मूड में लिखी बात जनसत्ता में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छपी... मज़ा आ गया.. पर अगर अविनाश भाई न बताते तो शायद मुझे पता भी नहीं चलता .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप सबके लिए यह&amp;nbsp;कट्टिंग और मूल&amp;nbsp;लिंक&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;a href="http://nayasamay.blogspot.com/2008/11/blog-post.html"&gt;http://nayasamay.blogspot.com/2008/11/blog-post.html&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-3535983248826262911?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/3535983248826262911/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=3535983248826262911' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3535983248826262911'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3535983248826262911'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='पोस्ट जनसत्ता में प्रकाशित'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TJNtkdnMhoI/AAAAAAAAAFc/0UlRjoeM5_E/s72-c/mankibaat.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-3329313591258130356</id><published>2010-06-22T06:08:00.000-07:00</published><updated>2010-06-22T06:10:35.683-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म'/><title type='text'>क्या आपने 'फिराक़' देखी है?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TCC2HhJuzDI/AAAAAAAAAEw/34gGrcG_RfU/s1600/firaaq01.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5485584586411789362" style="FLOAT: left; 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एक्टर-टर्न्ड-डायरेक्टर नंदिता दास ने दगों के आफ्टर-इफेक्ट्स पर केन्द्रित किया है। इस फ़िल्म में दंगे का एक भी दृश्य नहीं है। फिल्म का शिल्प कई छोटी छोटी कहानियों की बुनावट से बना है। नंदिता दास के अनुसार इतनी बड़ी परिघटना में वैयक्तिक रूप से नायकों और खलनायकों का चुनाव असंभव है, दंगों में बड़े या छोटे नुकसान की पहचान के बजाय मेरा उद्देश्य था कि अपने आस-पास लगातार उपजते जाते आतंक के अण्डरटोन्स को समझ पाने की जो उलझन मुझे दुनिया के हर इंसान के भीतर दिखाई देती है, मैं उसका कहीं रेखांकन कर सकूँ। इस दृष्टि से नंदिता का यह चुनाव मुझे ठीक लगा है क्योंकि दंगों और विभीषिकाओं पर बनने वाली गैरतटस्थ डाक्यूमेंट्रीज़या फिर मसाला एलिमेण्ट्स से भरी फिल्मों ने इस समझ का और अधिक नुकसान ही किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कथा के नाम पर फिल्म में कुछ छोटी कहानियाँ हैं जो कि गुजरात की कई हज़ार कहानियों में से चुनी गयी हैं। एक भीरू गृहिणी, जिसने परिवार के भयवश शरण मांगती हुई एक स्त्री पर अपना दरवाज़ा बन्द कर दिया था, के कानों में हमेशा दरवाज़े की आवाज़ गूँजती रहती है। दो दोस्त (जिनमें से एक मुसलमान है) जो बदले वक्त में अपनी मित्रता के नये आयाम तलाश रहे हैं। एक मासूम बच्चा जो दंगों में अपना पूरा परिवार खो चुका है, और अपने अब्बू की तलाश में भटक रहा है। कुछ निम्नवर्गीय मुसलमान लड़के जो खुद पर हुए जुल्म के इंतक़ाम की असफल कोशिशें कर रहे हैं। और, एक मुस्लिम वृध्द संगीतज्ञ जो दंगों की हकीक़त से पूरी तरह नावाकिफ है, जिसे आज भी अपने संगीत पर पूरा भरोसा है (यद्यपि दंगों के बाद उसकी हफ्तावार बैठकों में आना लोगों ने बन्द कर दिया है), और जिसका भरोसा तब टूटता है जब उसे वली दकनी की मज़ार के टूटने का पता चलता है। इन सारी कहानियों के पात्रों में जो पीड़ा की एक मध्दिम तासीर निर्देशक द्वारा आरोपित है, वह अद्भुत है। पूरे दृश्यांकन का समय चौबीस घण्टों का है, जाहिर है इस वक्त में कुछ भी बदला नहीं, बदला जा भी नहीं सकता था, बदलने के किसी प्रयास की कोशिश दिखाना नंदिता का ध्येय भी नहीं था, पर एक बेचैनी, एक कसमसाहट और अपने भीतर की आवाज़ों और चीखों को महसूस हम ज़रूर कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नंदिता ने इस फिल्म को एक विरेचक अनुभव कहा है। मैं हिन्दू मुसलमान सम्प्रदायों के सम्बन्धों और उनकी टकराहट पर क्लीशे बन चुकी बातों में नहीं जाना चाहता पर इस फिल्म को देखते हुए एक महत्वपूर्ण बात आप महसूस करेंगे कि निम्नतम वर्ग से लेकर समाज के उच्च वर्ग तक हमारी समझ पर हमारे व्यक्तिगत भय और पूर्वग्रह इस हद तक हावी हैं, कि तटस्थता के अभिप्राय भी कहीं गुथे और उलझे हुए नज़र आते हैं। इस फिल्म के माध्यम से मैं किसी बड़े बदलाव या प्रभाव की उम्मीद न भी करूँ तो समाज के चिंतनशील वर्ग के माथे पर सोच की कुछ धारियाँ ज़रूर देखना चाहूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नसीर, दीप्ति नवल, रघुवीर यादव, संजय सूरी, शहाना गोस्वामी, टिस्का चोपड़ा और साथ ही अचरज और डर से भरे हुई ऑंखों वाले बच्चे 'मोहसिन' के रूप में मो. समद के अभिनय ने इस फिल्म की सान्द्रता को रेखांकित किया है। यह नंदिता दास की निर्देशक के रूप में पहली फिल्म है, और उन्होंने प्रयोगशील सिनेमा का एक नया गलियारा खोला है। आज जब नये सिनेमा के मुहावरे में बन रही फिल्मों में क्राफ्ट की बाजीगरी ज्यादा दिख रही है, नंदिता ने शिल्प और माध्यम-भाषा की ओर बहुत प्रयोग करने की बजाय विषय की नब्ज़ पकड़ने का काम किया है, जो मेरे विचार से अधिक गंभीर प्रयास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काइट्स, रावण और राजनीति जैसी वाहियात फिल्मों का मर्सिया पीटने की बजाय हमें ऐसी फिल्में देखने और सराहने की आदत डालने की बेहद ज़रूरत है!&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-3329313591258130356?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/3329313591258130356/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=3329313591258130356' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3329313591258130356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3329313591258130356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html' title='क्या आपने &apos;फिराक़&apos; देखी है?'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TCC2HhJuzDI/AAAAAAAAAEw/34gGrcG_RfU/s72-c/firaaq01.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-671178641630057627</id><published>2010-06-08T02:44:00.000-07:00</published><updated>2010-06-08T03:32:18.037-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शलभ श्रीराम सिंह'/><title type='text'>शलभ श्रीराम सिंह की कवितायें</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TA4Yv3lfwvI/AAAAAAAAAEQ/XC-LH7fEwCU/s1600/ShalabhShriRamSingh.jpeg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5480345007210611442" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 117px; CURSOR: hand; HEIGHT: 180px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TA4Yv3lfwvI/AAAAAAAAAEQ/XC-LH7fEwCU/s200/ShalabhShriRamSingh.jpeg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;em&gt;आज बहुत दिनों के बाद कोई पोस्ट लगा रहा हूँ। अब ऐसा क्यूँ हुआ इसके कारणों में गए बिना कुछ नया पोस्ट करना चाह रहा हूँ।&lt;br /&gt;इधर मैने सोचा है कि अपने आस-पास (फैजाबाद और आस पास) के कुछ वरिष्ठ कवियों की कवितायेँ पढ़ी-पढाई जाएँ, तो आज शुरू कर रहा हूँ शलभ श्रीराम सिंह से .....&lt;br /&gt;जिनका काव्य, जिनकी मित्रताएं, जिनका जीवन सब कुछ काफी चर्चित रहा है ...............&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शलभ श्रीराम सिंह&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जन्म: 05 नवंबर 1938 निधन: 22 अप्रैल 2000&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;काव्य-पाठ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;खूब-खूब हुआ काव्य-पाठ&lt;br /&gt;खूब-खूब सराहा गया एक दूसरे को जमकर&lt;br /&gt;खूब-खूब जगा और जगाया गया आत्मबोध&lt;br /&gt;श्रोता चुपचाप रहे कि शायद कहीं हों उनके भी शब्द&lt;br /&gt;उनका भी कोई बिम्ब हो कहीं&lt;br /&gt;कहीं कोई जानी- पहचानी लय उनकी हो अपनी&lt;br /&gt;या फिर कोई बात&lt;br /&gt;घर-घाट, बाजार-हाट, लूट-पाट भी &lt;br /&gt;कुछ  भी नहीं था कहीं केवल काव्य-पाठ&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;काव्य-पाठ केवल था कवियों की भाषा में&lt;br /&gt;कवियों की बातचीत की तरह&lt;br /&gt;यहाँ तक कि समय भी अनुपस्थित था&lt;br /&gt;वहाँ&lt;br /&gt;उनके बीच&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;strong&gt;शायद&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;ताज़ा-पकी रोटियों की महक&lt;br /&gt;मेरे नथुनों के आस-पास मंडरा रही है&lt;br /&gt;तुम्हें भूख लगी है शायद&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;ठंडे पानी का स्पर्श&lt;br /&gt;मेरे गले को सींचता हुआ जान पड़ रहा है&lt;br /&gt;तुम्हें प्यास लगी है शायद&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span class=""&gt;बोझिल-बोझिल होती हुई&lt;br /&gt;झपकने लगी हैं मेरी पलकें&lt;br /&gt;तुम्हें नीद आ रही है शायद&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-671178641630057627?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/671178641630057627/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=671178641630057627' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/671178641630057627'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/671178641630057627'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='शलभ श्रीराम सिंह की कवितायें'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__o0pgp2pO0s/TA4Yv3lfwvI/AAAAAAAAAEQ/XC-LH7fEwCU/s72-c/ShalabhShriRamSingh.jpeg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-7109138713724078626</id><published>2008-11-13T05:54:00.000-08:00</published><updated>2008-11-13T05:55:40.630-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>आखिरी बार कब आपने अपने मन की सुनी थी?</title><content type='html'>&lt;p&gt;आज यूँ कहीं पढ़ रहा था कि प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध अपनी मनःस्थिति का बेहद सम्मान करते थे। जाहिर है उनकी इन मनःस्थितियों में दो चीज+ें अवश्य थीं - बतियाना और चाय पीना। सुना है कि अपने ब्याह में वे सिर्फ इसलिए विलम्ब से पहुँचे कि नदी के किनारे किसी से बतियाने लगे थे और अपने छोटे भाई के विवाह में जाते हुए ट्रेन सिर्फ इसलिए छोड़ दी क्योंकि प्लेटफार्म पर वे इत्मीनान से चाय पीना चाहते थे। यह अलग बात है कि उस ट्रेन में उनका परिवार सवार था जो कई घण्टों तक इसके कारण परेशान हुआ।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह सबकुछ मैं इसलिए दोहरा रहा हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि कम से कम अपनी मनःस्थिति का सम्मान करना आज के इस कठिन जीवन में हमारे लिए असम्भव सा होता जा रहा है। हम एक तरह से हमेशा हाँफते रहते हैं कमिटमेन्ट्स को पूरा करने के लिए, चाहे वे हमारे पेशे के हों या सम्बन्धों के। घड़ी के चौबीस घण्टे भी हमें कम पड़ते हैं इस भागदौड़ भरे जीवन को जीने के लिए। हम हमेशा समझौता करते हैं - अपना पसंदीदा गाना सुनना छोड़कर फोन सुनते हैं, शाम का घूमना छोड़कर लगातार काम निपटाते हैं। छुट्टियाँ (अगर वे कहीं हैं) मिलने पर भी हर पल आधे मन और आधे मस्तिष्क से अपने काम में डूबे रहते हैं। हम हर समय जवाबदेह रहते हैं और इसीलिए हम हमेशा कमर तोड़ते रहते हैं कि हमारे पास सही जवाब हों। हमारा यह समय ÷नो सर' सुनने का नहीं है और ÷यस सर!' यह दो शब्द कह पाने की स्थिति में होने के लिए हमें रोज अपने मन को कई-कई बार मारना पड़ता है। हम आकण्ठ काम में डूबे रहते हैं एक आरामदेह भविष्य की आशा के साथ।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आप खुद याद करें कि आखिरी बार कब आपने आँखें बन्द करके अपने घर में लेटकर एक धीमा रोमानी गाना बिना किसी व्यवधान के सुना था? आखिरी बार कब आपने अपनी चाय पूरे इत्मीनान के साथ सूर्यास्त को देखते हुए पी थी? कब आप बारिश में निःसंकोच भीगे थे बिना किसी डर के साथ? कब आपने एक पूरा क्रिकेट मैंच देखा था बॉल-टू-बॉल? कब आपने घर में डीवीडी पर एक बार में कोई फिल्म देखी थी? आखिरी बार कब आपने एक पूरा उपन्यास एक रीडिंग में खत्म किया था? आखिरी बार कब आप दोपहर में सोये थे और कोई नहीं था आपको जगाने वाला? आखिरी बार कब आपने अपने जीवन में आये हुए लोगों को सिर्फ याद करने के लिए याद किया था (बिना उनसे किसी काम के)? और आखिरी बार कब आपने अपनी खुशी के बारे में मतलब सिर्फ अपनी खुशी के  बारे में सोचा था?&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आखिरी बार कब आपने अपने मन की सुनी थी?&lt;br /&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-7109138713724078626?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/7109138713724078626/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=7109138713724078626' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7109138713724078626'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7109138713724078626'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='आखिरी बार कब आपने अपने मन की सुनी थी?'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-6039319253764719926</id><published>2008-10-20T08:46:00.000-07:00</published><updated>2008-10-20T08:48:25.319-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म'/><title type='text'>वेलकम टू सज्जनपुर या वेलकम टू बेनेगल्स ट्रैजेडी</title><content type='html'>कल श्याम बेनेगल के नाम पर इस फिल्म को देखना हुआ। फिल्म की शुरुआत और स्टोरीटेलिंग से लगा कि फिल्म अच्छी होगी। लेकिन ज्यों-ज्यों फिल्म आगे बढ़ती गई, मन बेहद निराश हुआ। कॉमेडी बनाने की कोशिश में फिल्म का कबाड़ा हो गया। वैसे कला का यह एक सामान्य सत्य है, कि एक कलाकार को प्रयोगवादी होना चाहिए लेकिन प्रयोग के चक्कर में आप अगर अपनी कलात्मकता की असली आत्मा से विचलित हों तो शायद यह ठीक नहीं होगा। वैसे फिल्म में उन सारे प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है जो समानान्तर सिनेमा और समानान्तर सोच को प्रदर्शित करते हैं। नुक्कड़ नाटक, नौटंकी और गीतों का लोकतांत्रिक व्यवस्था में विन्यस्त भ्रष्टाचार के प्रतिवाद में जैसा उपयोग किया गया है, वह दर्शाता है कि निर्देशक के मन में इस कॉमेडी के माध्यम से एक ऐसा सैटायर रचने की कोशिश रही है जो हल्के फुल्के ढंग से बात को कहते हुए लोगों को सोचने को मजबूर कर दे।&lt;br /&gt;सबसे बड़ी चीज जो अखरती है वह है फिल्म में एक प्रभावशाली कथा का अभाव। जिस एक छोटी सी कथा के चारों ओर फिल्म का सारा ताना-बाना बुना गया है, वह प्रभाव नहीं छोड़ती और सच बात तो यह कि वह पूरी तौर पर यथार्थवादी कहानी भी नहीं है। यथार्थ के स्तर पर फिल्म में कई झोल हैं, जिनके कारण श्रेयस तलपड़े और अमृता राव के चरित्रों का पूरी तरह विकास नहीं हो पाया है। चिट्ठी लेखक का जो किरदार श्रेयस ने निभाया है, उसको ठीक तरह से शिल्पित करने में निर्देशक असमर्थ रहा है। जिन्होंने कभी गाँव में या शहर की कचहरी या तहसील वगैरह में असली चिट्ठी लेखकों/अर्जीनवीसों को देखा है उन्हें यह किरदार समूचे तौर पर अवास्तविक लगेगा। निर्देशक ने उत्तर प्रदेश के एक गॉंव सज्जनपुर की तस्वीर पेश करने की कोशिश की है और यह चाहा है कि दर्शक खुद को उस गॉंव या कस्बे से जुड़ा हुआ महसूस करें। परन्तु सच्चाई यह है कि निर्देशक ने श्रेयस और अमृता के किरदारों पर केन्द्रित होने के चक्कर में कस्बाई माहौल के अन्य चरित्रों के विकास पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है, जिसके कारण यशपाल, दिव्या दत्ता जैसे मंझे हुए कलाकारों का ठीक से उपयोग तक नहीे हो पाया है। श्रेयस और अमृता के बीच फिल्माये गये कई दृश्य दोहराये हुए और अनावश्यक लगते हैं। इसका एक कारण हाल की सफलताओं के कारण श्रेयस की बढ़ी हुई मार्केट वैल्यू भी हो सकती है, क्योंकि फिल्म के प्रमोशन में भी ये दोनों सितारे गाहे-बेगाहे नजर आते रहे। मध्यांतर के बाद रबर की तरह फिल्म खिंचती हुई नजर आती है और अन्त में एक अत्यन्त अवास्तविक दृश्य है, जब हिन्दी का प्रकाशक फिल्म के नायक को एक हाथ से उसके उपन्यास की प्रति सौंपता है और दूसरे हाथ से उसकी रॉयल्टी का चेक।&lt;br /&gt;हो सकता है, यह आंकलन कुछ लोगों को अतिवादी लगे, लेकिन सच यह है कि जब आप श्याम बेनेगल की फिल्म देखते हैं तो उससे कुछ अधिक उम्मीदें रखते हैं। यह फिल्म कहीं से भी बेनेगल की फिल्म नहीं लगती। कॉमेडी बनाने के फेर में यह एक ट्रैजेडी बनकर रह गयी है। हालांकि मुझे लगता है कि गम्भीर फिल्म बनाने वालों के साथ अक्सर ऐसा होता है, अभी हाल में ही नाकेश कुकनूर ने बॉम्बे टू बैंकॉक नाम से एक ऐसा ही असफल प्रयास किया था।&lt;br /&gt;फिलहाल व्यक्तिगत तौर पर मुझे श्याम बाबू से कुछ ज्यादा उम्मीदें थीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-6039319253764719926?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/6039319253764719926/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=6039319253764719926' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/6039319253764719926'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/6039319253764719926'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='वेलकम टू सज्जनपुर या वेलकम टू बेनेगल्स ट्रैजेडी'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-6557630176860427599</id><published>2008-09-19T07:09:00.000-07:00</published><updated>2008-09-19T07:10:53.798-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>एक आलसी कवि की डायरी</title><content type='html'>यह एक अजीब सूनेपन का समय है। सच कहूँ तो बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा न ब्लॉग पर और न कागज पर। शायद ध्यान दूँ तो कॉलेज के रोजनामचे और चेक बुक्स के अलावा दस्तखत भी कहीं नहीं किये। इतना सूनापन तो कभी नहीं था। कुछ कुछ जीवन बचपन की गर्मियों की दोपहर जैसा हो गया है, जब हमारे पास कोई काम नहीं होता था और माँ पूरे यत्न में रहती थीं कि कैसे इसे सुला दिया जाये और लगभग-लगभग सफल भी हो जाती थीं। कभी लगता है कि ऐसी ही किसी स्थिति में निराला जी ने 'पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है' जैसा कुछ लिखा होगा। खैर वे निराला थे और जितना यह सच है उतना ही यह भी कि हम निराला नहीं हैं। इधर इस अलेखन ने कई सम्बन्ध भी खराब कर दिये हैं। कई एसाइनमेंट्स थे, जो अब कालातीत हो गये हैं। वैसे भी मैं खुद को एक धीमा लेखक मानता हूँ और इधर तो यह धीमापन एक भयंकर स्थगन में बदल गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा एक बात और भी है, पढ़ इधर खूब रहा हूँ, फिल्में खूब देख रहा हूँ और खूब संगीत सुन रहा हूँ। और कभी कभी ऐसा करते हुए लगता है कि शायद समाज को ऐसे लोगों की आज ज्यादा जरूरत है। इतना कुछ और इतनी ज्यादा मात्रा में सृजित हो रहा है हमारे चारों ओर, कोई इसे नोटिस करने वाला भी तो होना चाहिए। यह जरूर है कि इस स्थगित होकर पढ़ने की प्रक्रिया में बहुत सारा कुछ ऐसा भी मिला जिसे पढ़ने का मन नहीं किया, लेकिन बहुत कुछ अच्छा भी मिला। मेरे एक वरिष्ठ कवि मित्र हैं, जिन्हें हम प्यार से भूतपूर्व कवि कहते हैं। मैं उनकी बात का आदर करते हुए यह कोट करना चाहता हूँ कि वे कभी कभी कहते हैं कि अब जब मैं कविता लिखने के बारे में सोचता हूँ तो मुझे उबकाई आती है। जब पहली बार मैंने उनके मुँह से ऐसा सुना तो मुझे बड़ा अजीब लगा लेकिन अपने इन दिनों में जब मैं उनकी बात को याद करता हूँ तो कुछ सोचने को विवश हो जाता हूँ कि आखिर किस मन:स्थिति में उन्होंने वह बात कही होगी। खैर अपना अपना स्थगन-काल है, उनका थोड़ा लम्बा हो गया, हो सकता है मेरा थोड़ा कम अवधि का हो और कल ही मैं इसी ब्लॉग पर एक कविता लिख मारूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है ने लेखकों ने न लिखने के कारणों पर भी विचार किया है। किशोरावस्था में पढ़ा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का 'क्या लिखूँ' टाइप कुछ याद आता है। पर यहाँ तो सामग्री की कमी नहीं है, रोज ही कोई न कोई विचार खलबली मचाता है, यहाँ बीमारी कुछ कुछ क्यों लिखूँ टाइप की है। आचार्य मम्मट ने लेखन के लिए प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास इन तीन चीज़ों की दरकार मानी थी। सोचूँ तो लगता है साला अपने पास तो इन तीनों का ही टोटा है। आज अगर मम्मट या दण्डी होते तो जरूर सबसे पहले मुझे ब्लैकलिस्टेड कर देते कि अबे! बिना रजिस्ट्रेशन के कविता लिख रहा है। खैर ब्लैकलिस्टेड तो वे वैसे भी मुझे कर देते कि ये सब जो तू कागद काला करता है दिन भर, ये कौन सी कविता है, जा हम तो नहीं मानते इसे कविता। बहिष्कार हो जाता मेरा तो। वैसे आज भी मम्मटों और दण्डियों की कमी नहीं है, जो यदा-कदा अपना दण्ड हम जैसे समकालीनी कवियों पर फिराते रहते हैं। एक मजेदार बात आपको बताता हूँ एक बार एक गरिष्ठ कवि (ये मेरा कोडवर्ड है, आपको इसके बारे में बाद में बताऊँगा) ने मुझसे प्यार से कहा कि देखो भाई बुरा मत मानो ये तुम लोग जो लिखते हो, यह सब बेकार है। कविता ऐसी होनी चाहिए जो जबान पर तुरन्त चढ़ जाये। तुरन्त उन्होंने उदाहरणार्थ की हेडिंग मारकर डैश लगाया और चार पाँच अहा! और कहा! ध्वनियों वाली कवितायें टेल दीं। मैं उस दिन अवज्ञा के मोड (ध्यान रखिए मूड नहीं मोड) में था और मैंने कहा - गुरू जी जबान पर चढ़ने की दृष्टि से देखा जाए तो दुनिया का श्रेष्ठतम साहित्य गालियाँ हैं, क्योंकि वे हर किसी की जबान पर चढ़ी रहती हैं। कहना न होगा कि मैंने उनकी शाम-वाम, पान-वान और आन-बान तीनों का मज़ा उस दिन एकसाथ खराब किया। खैर, हम कवि हैं, और बहुतों की नजर में उद्दण्ड कवि हैं, इसलिए ऐसी बातों का होना लाज़िमी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल मूल समस्या पर आते हैं, न लिखने की समस्या पर। मैंने पाया है कि न लिखने के पीछे एक और बड़ा कारण है कि आप पर कुछ कालजयी टाइप लिखने का फितूर सवार हो जाता है और उस चक्कर में आप कुछ भी लिखने से परहेज करते हैं। आज भी मुझे कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं जो महाकाव्य लिख रहे हैे। आश्चर्य में पड़ गये न, एक ऐसे समय में जिसमें मेरे भारत को छोड़कर कुछ भी महान शेष नहीं है, महाकाव्य आखिर लिखा किसपर जा रहा है? फिलहाल अपना हाथ तो आजकल महाकाव्य क्या काव्य-पंक्ति में भी तंग है। खैर, इस सूनेपन के पतझड़ में मैं बसंत की प्रतीक्षा में हूँ। और, अभी यह लाइन लिखते-लिखते पत्नी ने गुजरते हुए इस लिखे का मजमून भाँप लिया है और कहा है कि तुम लेखक लोग भी अजीब सनकी होते हो, न लिखने पर दो पन्ने का निबन्ध लिख सकते हो, दस ठो लाइन की कविता नहीं लिख सकते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल मैं उसे क्या बताऊँ कि मुझे हुआ क्या है।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(ऊपर लिखी किसी भी बात की सत्यता के कितने भी प्रतिशत का मेरा क्या दुनिया जहान के किसी भी आदमी से कोई लेना देना नहीं है, फिर भी बुरामन्तु (मेरा कोडवर्ड 'बुरा मानने वाले लोग) बुरा मान सकने के लिए स्वतंत्र हैं)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-6557630176860427599?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/6557630176860427599/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=6557630176860427599' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/6557630176860427599'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/6557630176860427599'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='एक आलसी कवि की डायरी'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-3510796744663137618</id><published>2008-06-29T07:23:00.001-07:00</published><updated>2008-06-29T07:23:54.009-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अवधी कविता'/><title type='text'>बरात जाब जरूरी है</title><content type='html'>&lt;em&gt;अवध के ग्रामीण अंचल में बारात जाना एक अद्वितीय अनुभव है..... जो न गया हो वह उसे जान नहीं सकता, कहें तो यह एक अविगत अनुभव है; फिर भी अवधी के एक अनाम कवि की यह बानगी प्रस्तुत है।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बरात जाब जरूरी है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुधई के लड़िका कै ब्याह रहा&lt;br /&gt;हमरे जियरा मा चाह रहा&lt;br /&gt;दस बीस रहे संग साथ मा&lt;br /&gt;तब हमहूँ चले बारात मा&lt;br /&gt;जब बीत गयी आधी रात&lt;br /&gt;तब गाँव मा पहुँची बरात&lt;br /&gt;बुधई भैया न देर किहिन&lt;br /&gt;पहुँचतै गोला दगवाय दिहिन&lt;br /&gt;कुकुरवे पहिले स्वागत किहिन&lt;br /&gt;दौड के गोड़वा मा काट लिहिन&lt;br /&gt;गाँव वाले सब गये डेराय&lt;br /&gt;लाठी लै-लै सब गये आय&lt;br /&gt;वे जानिन डाकू गये आय&lt;br /&gt;चारिंउ ओर से लिहिन घेराय&lt;br /&gt;पहचान मिला तब हाथ मिला&lt;br /&gt;फिर सबसे जाय बरात मिला&lt;br /&gt;समधी-समधी में भवा बवाल&lt;br /&gt;अब दुआरे कै सुना हाल&lt;br /&gt;जब होय लाग दुआरे कय चार&lt;br /&gt;र्इंटा, ढेला कै भवा बौछार&lt;br /&gt;केहुक मुँह टूट केहुक हाथ टूट&lt;br /&gt;चिल्लाये भैया मूड़ फूट&lt;br /&gt;भागेन हमहूँ और मुसरीदीन&lt;br /&gt;खूँटा से गोड़वा तूर लिहिन&lt;br /&gt;तब हम भागेन घरा सेवान&lt;br /&gt;हमहूँ और मुसरीदीन&lt;br /&gt;ब्याह के कारण जिउ दै दीन&lt;br /&gt;प्रदीप कहिन मजबूरी है&lt;br /&gt;बरात जाब जरूरी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-3510796744663137618?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/3510796744663137618/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=3510796744663137618' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3510796744663137618'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3510796744663137618'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='बरात जाब जरूरी है'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-5508711280432711947</id><published>2008-04-09T08:26:00.000-07:00</published><updated>2008-04-09T08:34:44.100-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुरा के मेरी पोस्ट'/><title type='text'>चुरा के मेरी पोस्ट कहां तुम चले</title><content type='html'>मेरी पोस्ट &lt;a href="http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post.html"&gt;वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़&lt;/a&gt;  हूबहू शशि भाई ने अपने ब्लाग पर डाल दी है। उन्होंने कर्टसी में मेरा नाम भी नहीं दिया। बहुत आहत महसूस कर रहा हूं।&lt;br /&gt;शशि भूषण जी बेहद प्रतिभाशाली कथाकार हैं व्यक्तिगत रूप से उनकी कहानियों का मैं बड़ा प्रशंसक हूं। पता नहीं उन्होंने यह क्यों किया। शब्द दर शब्द पोस्ट एक जैसी है। मैंने 17 अगस्त 2007 को यह पोस्ट लिखी थी .. उनके ब्लाग पर यह 23 सितम्बर 2007 की तारीख में है। अब आप सब ही न्याय करें ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरी पोस्ट &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post.html"&gt;http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post.html&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शशि जी की पोस्ट&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://kathavartashashi.blogspot.com/2007/09/blog-post_4764.html"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;http://kathavartashashi.blogspot.com/2007/09/blog-post_4764.html&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-5508711280432711947?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/5508711280432711947/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=5508711280432711947' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5508711280432711947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5508711280432711947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='चुरा के मेरी पोस्ट कहां तुम चले'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-3300486495951958744</id><published>2008-03-13T09:17:00.000-07:00</published><updated>2008-03-13T20:10:32.613-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म'/><title type='text'>एट एण्ड ए हाफ : कलात्मक क्राइसिस के बीच काँपते हुए स्वप्न</title><content type='html'>&lt;a title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" href="http://www.chitthajagat.in/?claim=udipeuoflbgw"&gt;&lt;img title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/__o0pgp2pO0s/R9lT_yPrJ-I/AAAAAAAAAB0/faZI5ZChe3Y/s1600-h/8half.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5177261601923475426" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" height="200" alt="" src="http://bp1.blogger.com/__o0pgp2pO0s/R9lT_yPrJ-I/AAAAAAAAAB0/faZI5ZChe3Y/s320/8half.jpg" width="189" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आज बड़े दिनों बाद कुछ फुर्सत निकली तो फेडेरिको फेलिनी की फिल्म 'एट एण्ड ए हाफ' देखी। इस फिल्म को वर्ष 1963 में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म का एकेडमी एवार्ड मिला था। फेलिनी इतालवी सिनेमा की बेहद चर्चित शख्सियत रहे हैं। 'एट एण्ड ए हाफ' का नाम पहले था 'ला बेला कन्फ्यूजियोन' मतलब 'द ब्यूटीफुल कन्फ्यूज़न'। फेलिनी की शख्सियत को ध्यान में रखते हुए तो यही नाम ज्यादा ठीक था। यह फिल्म फिल्म मेकिंग के बारे में है, नायक गुइदो एक निर्देशक है और उसे लगता है कि उसके आस पास की दुनिया ठीक उसकी रचनात्मकता की ही तरह डूब रही है। यह फिल्म कहानी कहने की कला में समय के एक द्रव की तरह के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म की शुरुआत में गुइदो एक कार में ट्रैफिक जाम में फंसा हुआ है उसकी कार के शीशे बन्द हैं और कार में धुँआ भर गया है, उसकी साँस घुट रही है और वह अचानक कार की छत से ऊपर आसमान में उड़ जाता है। थोड़ी ही देर बाद दो आदमी दिखते हैं, जिनमें से एक के हाथ में एक रस्सी है जिसका एक सिरा गुइदो के पैर में बंधा हुआ है, जिसके माध्यम से वह उसे खींच कर उतार लेता है। यह एक प्रतीक है कि एक रचनात्मक आदमी के जीवन में दुनियावी चीज़ों का असहनीय धुंआ हमेशा भरा रहता है जिससे वह कितना भी भागना चाहे उसे वापस आना ही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुइदो का प्रोडयूसर उसके एक ऐसे आइडिया के पीछे काफी पैसा लगा चुका है, जिसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता है यहाँ तक कि गुइदो को भी। दरअसल वह अपनी जिन्दगी की जटिलताओं को ही फिल्माना चाहता है, उसका इरादा एक परम्परागत फिल्म बनाने की बजाय एक फ्रैग्मेण्टेड फिल्म बनाने का है। गुइदो के लिए सपने ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वे सपने जो उसकी रोजमर्रा की ज़िन्दगी से निकल आते हैं। नायिकाएँ उसके पीछे पड़ी हैं कि वह उन्हें उनके रोल के बारे में बताए, लेकिन गुइदो अपनी फैंटेसीज में मग्न है। गुइदो का बचपन कैथोलिक माहौल में बीता है और विचारधारा के स्तर पर वह माक्र्सवादी है। उसकी एक ही मनोवृत्ति जो पूरी फिल्म में उभरकर सामने आती है - वह है प्रोटोगैनिज्म। फिल्म के मध्य में उसकी पत्नी लुईसा व्यथित होकर उससे कहती है कि तुम पूरी तरह से एक झूठ हो, तुम्हें सिर्फ एक बात पसन्द है और वह है पूरी दुनिया को यह दिखाना कि तुम कितने आश्चर्यजनक हो। गुइदो की बहुत सारी फैन्टेसीज़ हैं, पैसा देकर डेविल कही जाने वाली महिला सारागीना का नृत्य देखना, 'आसा निसी मासा' के चैण्ट से डरना, अपने मृत माता पिता से बात करना और ऐसी बहुत सारी चीज़ें। सबसे महत्वपूर्ण फैन्टेसी है - एक हरम की कल्पना जहाँ उसकी ज़िन्दगी में कभी न कभी आई हुई सभी औरतें हैं, यहाँ तक कि वे औरतें भी जिन्हें सिर्फ गुइदो ने देखा है और उनके साथ कभी होने की कल्पना की है, वह खुद को उनके मालिक की तरह देखता है, ताज्जुब की बात है कि उसकी पत्नी लुइसा इस हरम में एक हाउसकीपर की तरह है। पहले पहले देखने पर ये फैन्टेसीज़ एक लिबिडो का परिणाम लगती हैं, लेकिन वस्तुत: ऐसा है नहीं। हम पाते हैं कि गुइदो एक ऐसे चरित्र के रूप में है जो संसार को एक छोटे बच्चे की दृष्टि से देखता है और इसीलिये उसकी दुनिया में इतने सारे अलग-अलग संसारों के सपने हैं। फिल्म के अंत में उसकी अन्तिम फैंटेसी के रूप में भी हम देखते हैं उसकी दुनिया में शामिल सभी लोग एक सर्कस की आकृति में उसके साथ हैं और वह उन सबको फिल्म के एक सीन की तरह निर्देशत कर रहा है, और उसका बचपन का रूप सामने ट्रम्पेट बजा रहा है।&lt;br /&gt;इस फिल्म में बहुत सारे प्रभाव एक साथ हैं पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक रचनात्मक जीनियस को किस तरह पूरी दुनिया समझने में असफल रहती है। गुइदो अपने जीवन की सारी औरतों को जिनमें कुमारियाँ भी हैं, प्रेमिकाएँ भी हैं पत्नी भी है, उसकी माँ भी है .. बेहद प्यार भी करता है और नफरत भी करता है पर वह उन सबके प्रति एक तरह का ईमानदार व्यक्तित्व है। वह एक निर्दोष बच्चे की तरह है और उसके आस-पास की दुनिया समझदार, परिपक्व और चालबाज बन गई है, फिर भी वह उन चालबाज और तथाकथित परिपक्व लोगों को इतना प्यार करता है कि वे उसकी फैंटेसीज का हिस्सा है। दुनिया के पास उसके लिए अनगिनत सवाल हैं, लेकिन उसके पास इनमें से किसी का भी जवाब नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म में नायक के साथ रहने वाला फिल्म क्रिटिक हमेशा लम्बे लम्बे दार्शनिक और सैध्दान्तिक वक्तव्य बघारा करता है, जिनसे नायक ऊबता रहता है, लेकिन अन्त में फेलिनी ने उससे एक रिमार्केबल बात कहलवाई है कि ''कभी कभी नष्ट करना रचना करने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।''&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-3300486495951958744?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/3300486495951958744/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=3300486495951958744' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3300486495951958744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/3300486495951958744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2008/03/blog-post_13.html' title='एट एण्ड ए हाफ : कलात्मक क्राइसिस के बीच काँपते हुए स्वप्न'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/__o0pgp2pO0s/R9lT_yPrJ-I/AAAAAAAAAB0/faZI5ZChe3Y/s72-c/8half.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-7212903496013416955</id><published>2008-03-09T08:02:00.000-07:00</published><updated>2008-03-09T08:04:03.429-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>प्रकाश</title><content type='html'>&lt;strong&gt;प्रकाश&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हमें चाहिए धूप&lt;br /&gt;कि हम पढ़ सकें जीर्ण पन्नों को&lt;br /&gt;सुधार सकें नये लिखे के हिज्जे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने बोई है आसमानी खेत पर&lt;br /&gt;उजाले की कुँवारी हरी दूब&lt;br /&gt;हमारा रक्त पहले से है वातावरण में&lt;br /&gt;देखा है हमने आकाश के आईने में&lt;br /&gt;अपने पीले चेहरों का अक्स&lt;br /&gt;हम पोंछते हैं नारंगी सूरज पर जमी गर्द&lt;br /&gt;इस तरह हमने आकाश को दिया है&lt;br /&gt;हर ज़रूरी सामान&lt;br /&gt;कि वह बना सके उजाला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम एक पुराने लोहे जैसे&lt;br /&gt;काले दिन के नागरिक हैं&lt;br /&gt;हमें थोड़ा प्रकाश चाहिए&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-7212903496013416955?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/7212903496013416955/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=7212903496013416955' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7212903496013416955'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7212903496013416955'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='प्रकाश'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-1271126684871793953</id><published>2007-10-21T02:03:00.001-07:00</published><updated>2007-10-21T02:03:02.312-07:00</updated><title type='text'>नया समय के हुलिये में बदलाव</title><content type='html'>आज मैंने नयासमय का हुलिया थोड़ा बदल दिया है, आशा है आप लोगों को पसन्द आयेगा, अविनाश व बोधि भाई की तर्ज पर कुछ दोस्तों के चिट्ठे भी लिंकित करना शुरू किया हैं .....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-1271126684871793953?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/1271126684871793953/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=1271126684871793953' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/1271126684871793953'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/1271126684871793953'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/10/blog-post_21.html' title='नया समय के हुलिये में बदलाव'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-5922739666422514321</id><published>2007-10-18T08:17:00.001-07:00</published><updated>2007-10-18T08:17:10.294-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अवधी कविता'/><title type='text'>राम दोहाई पांड़े भईया</title><content type='html'>मुंह से खाली राम राम बा&lt;br /&gt;छूरी बाटै आंड़े भइया,&lt;br /&gt;राम दोहाई पांड़े भईया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मची अहै अंधेर करेरे, मनई मिलिहैं हेरे हेरे।&lt;br /&gt;कुलि बगुला भगतन कै ठठ्ठर, काव कही यक यक से कट्टर।&lt;br /&gt;फांसै के बीसन हथकंडा, खायं खुलासा मीट औ अण्डा।&lt;br /&gt;राम नाम कै धरे दुपट्टा, पियैं सराब औ खेलैं सट्टा।&lt;br /&gt;रात मा करिहैं हाथ सफाई, दिन मा रहिहैं ताड़े भइया।&lt;br /&gt;राम दोहाई पांड़े भईया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना बात चहै न माना, डेर लागै अब देख कै थाना।&lt;br /&gt;हियां न्याय कै करा न आसा, सब पैसा कै अहै तमासा।&lt;br /&gt;जे तहसील कचेहरी बाबू, उनके उपर और न काबू।&lt;br /&gt;लेखपाल होइ औरै गांठा, बिना फीस कै उठै न लाठा&lt;br /&gt;खेतिहर का सुख नहीं बदा बा, गरमी बरखा जाड़े भइया।&lt;br /&gt;राम दोहाई पांड़े भईया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेह कै राजनीत कै पेसा, वहिकी चमकी रहै हमेसा।&lt;br /&gt;यइ सब अहैं सांड़ सरकारी, नास करैं सारी फुलवारी।&lt;br /&gt;मौज करैं अच्छी कद काठी, भैंस वही कै जेहि कै लाठी।&lt;br /&gt;जेकै लहिगै बाटै यहिमा, दोषी तबौ दहाड़ै भइया,&lt;br /&gt;राम दोहाई पांड़े भईया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;उक्त कविता अवधी के लगभग एक अनाम कवि असविन्द द्विवेदी की है, जिनका बहुत कम उम्र में निधन हो गया था।&lt;br /&gt;मुझे असविन्द जनोन्मुख अवधी कविता के अद्भुत कवि लगे, मैं उनकी और रचनाएं जुटाने की कोशिश में हूं ..............&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-5922739666422514321?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/5922739666422514321/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=5922739666422514321' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5922739666422514321'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5922739666422514321'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/10/blog-post_18.html' title='राम दोहाई पांड़े भईया'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-8548201108491450594</id><published>2007-10-13T06:57:00.000-07:00</published><updated>2007-10-13T06:57:33.202-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चे ग्वेरा'/><title type='text'>चे के कुछ आैर फोटो</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOqXvMRCI/AAAAAAAAABY/EW44u2Z6MmE/s1600-h/che21.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120820003642033186" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOqXvMRCI/AAAAAAAAABY/EW44u2Z6MmE/s320/che21.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOgHvMRBI/AAAAAAAAABQ/bsyXzrvFemo/s1600-h/che19.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120819827548374034" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOgHvMRBI/AAAAAAAAABQ/bsyXzrvFemo/s320/che19.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOYHvMRAI/AAAAAAAAABI/Qe7OAC_x1wc/s1600-h/che18.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120819690109420546" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOYHvMRAI/AAAAAAAAABI/Qe7OAC_x1wc/s320/che18.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOHnvMQ-I/AAAAAAAAAA4/JAOwAXDV0to/s1600-h/che15.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120819406641578978" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOHnvMQ-I/AAAAAAAAAA4/JAOwAXDV0to/s320/che15.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOPXvMQ_I/AAAAAAAAABA/MP-Cb5enoJU/s1600-h/che17.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120819539785565170" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOPXvMQ_I/AAAAAAAAABA/MP-Cb5enoJU/s320/che17.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-8548201108491450594?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/8548201108491450594/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=8548201108491450594' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/8548201108491450594'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/8548201108491450594'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/10/blog-post_13.html' title='चे के कुछ आैर फोटो'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RxDOqXvMRCI/AAAAAAAAABY/EW44u2Z6MmE/s72-c/che21.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-6610594956082736412</id><published>2007-10-11T08:31:00.000-07:00</published><updated>2007-10-11T08:31:33.414-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चे ग्वेरा'/><title type='text'>चे ग्वेरा के कुछ यादगार फोटोग्राफ्स</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/Rw5A93vMQ9I/AAAAAAAAAAw/J4kICml4v04/s1600-h/che1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120101258044916690" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/Rw5A93vMQ9I/AAAAAAAAAAw/J4kICml4v04/s320/che1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/Rw5A13vMQ8I/AAAAAAAAAAo/smcg45CTRR8/s1600-h/Che&amp;amp;Fidel.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120101120605963202" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/Rw5A13vMQ8I/AAAAAAAAAAo/smcg45CTRR8/s320/Che%26Fidel.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; पहले सोचा था कि चे पर कुछ लिखा जाये, पर बाद में लगा कि क्यों न चे के कुछ यादगार फोटो डाल दिये जायें,  यहां कुछ फोटोग्राफ्स हैं, सबसे महत्वपूर्ण फोटो वह ग्रुप फोटो है जो अमेरिकी इंटेलीजेंस के अधिकारियों ने उनके शरीर के साथ खिंचवाया था ......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://bp0.blogger.com/__o0pgp2pO0s/Rw5AuHvMQ7I/AAAAAAAAAAg/_l2eMcWaAcs/s1600-h/che.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5120100987461977010" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/__o0pgp2pO0s/Rw5AuHvMQ7I/AAAAAAAAAAg/_l2eMcWaAcs/s320/che.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-6610594956082736412?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/6610594956082736412/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=6610594956082736412' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/6610594956082736412'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/6610594956082736412'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='चे ग्वेरा के कुछ यादगार फोटोग्राफ्स'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/__o0pgp2pO0s/Rw5A93vMQ9I/AAAAAAAAAAw/J4kICml4v04/s72-c/che1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-2847400002411995443</id><published>2007-09-30T09:40:00.000-07:00</published><updated>2007-09-30T09:40:47.003-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>मुन्नू मिसिर का आलाप</title><content type='html'>बहुत पक्का गला है मुन्नू मिसिर का&lt;br /&gt;अद्भुत गाते हैं मुन्नू मिसिर&lt;br /&gt;फिर भी भव्य सभाओं में नहीं जाते मुन्नू मिसिर&lt;br /&gt;कहीं किसी किताब में नहीं छपा है उनका नाम&lt;br /&gt;उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अयोध्या के नयेघाट पर गली जैसा कुछ&lt;br /&gt;गली जैसे कुछ में मोड़ जैसा कुछ&lt;br /&gt;मोड़ जैसे कुछ पर पीपल एक पुराना&lt;br /&gt;वहीं कुछ कुछ घर जैसा&lt;br /&gt;और भीतर झुलनी खटिया पर मुन्नू मिसिर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटी कोठरी में फैला मुन्नू मिसिर का अथाह एकान्त&lt;br /&gt;बातें करता रहता उनके तरल अंधेरे से&lt;br /&gt;जब बहुत कम कुछ याद रहता है मुन्नू मिसिर को&lt;br /&gt;जैसे वे भूल जाते हैं कि वे शाकद्वीपीय हैं या सरयूपारीण&lt;br /&gt;या फिर कितने साल हुए उन्हें रिटायर हुए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब उनसे ज्यादा दु:ख सामनेवाले को होता है&lt;br /&gt;कभी-कभी याद आ जाता है उन्हें कोई विचलित राग&lt;br /&gt;कोठरी के अंधेरे में तब टिमटिमाता है&lt;br /&gt;उनके बुजुर्ग गले का सुर&lt;br /&gt;चारपाई का सरकता ढीला निवाड़&lt;br /&gt;डगमगाता है एक प्राचीन हारमोनियम&lt;br /&gt;सीली कोठरी में सन्न-सन्न हवा दु्रत&lt;br /&gt;सांवली बिटिया बारती है एक अरूणाभ ढिबरी&lt;br /&gt;रौशनी को परनाम कर आलाप लेते हैं मुन्नू मिसिर&lt;br /&gt;साधते हैं एकसाथ सुर और अपनी चिरन्तन खांसी को&lt;br /&gt;शहर के उदास पीलेपन को मुग्ध करता है&lt;br /&gt;उनका खरखराता सधा गला&lt;br /&gt;गाना धीमे से शामिल होता है दुनिया में&lt;br /&gt;दुनिया से अचानक थोड़ा दूर जाते हैं मुन्नू मिसिर&lt;br /&gt;वे अपने दुखों से दूर जाते हैं इस तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने सुरों की नाव पर चढ़ वे घूम आते हैं नदी पार&lt;br /&gt;कभी उनके साथ होते हवा में शामिल&lt;br /&gt;तैरते रहते तमाम प्रतिबन्धित जगहों के ऊपर&lt;br /&gt;कभी दुबक जाते किसी जीर्ण प्राचीन खिड़की पर&lt;br /&gt;कान लगाकर सुनते उसकी जर्जर कुण्डी का संगीत&lt;br /&gt;फिर वे जाते टेढ़ीबाज़ार अपने सुरों के साथ समोसा खाने&lt;br /&gt;कहकहे लगाते उनके कन्धों पर रखकर हाथ&lt;br /&gt;थककर लौटते अंतत: अपनी उसी संकरी गली में&lt;br /&gt;विलम्बित आलाप में याद करते जीवन का अवरोह&lt;br /&gt;नष्ट छन्द नष्ट गद्य नष्ट संगीत&lt;br /&gt;जीवन एक बहदहवास भौंरे की चीख जितना शोर&lt;br /&gt;जीवन डूबती झलमल झपल रौशनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक खांस पड़ते हैं मुन्नू मिसिर&lt;br /&gt;हारमोनियम के कोने से छिल जाती है कुहनी&lt;br /&gt;एक ताज़ा दर्द सम्मिलित होता है&lt;br /&gt;मुन्नू मिसिर के आलाप में&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-2847400002411995443?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/2847400002411995443/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=2847400002411995443' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/2847400002411995443'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/2847400002411995443'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/09/blog-post_30.html' title='मुन्नू मिसिर का आलाप'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-9000083114181569346</id><published>2007-09-01T10:23:00.001-07:00</published><updated>2007-09-01T10:23:08.271-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्लासिक फिल्मों के रीमेक'/><title type='text'>क्यों बन रहें हैं क्लासिक फिल्मों के रीमेक</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;कुछ दिन पहले किसी ने हिन्दी सिनेमा के शहंशाह से सवाल किया कि हिन्दी फिल्में आस्कर की दौड़ में पीछे क्यों रह जाती हैं, तब उन्होनं अपने शहंशाही अंदाज़ में जवाब दिया कि आप लोग क्यों बार-बार आस्कर या विदेशों में पहचान की बात करते हैं, हिन्दी सिनेमा अपने आप में सम्पूर्ण हैं और उसे किसी आस्कर की ज़रूरत नहीं है।&lt;br /&gt;पर लगता है सच्चाई कुछ और ही है, हिन्दी सिनेमा में आज मौलिक विचार की बड़ी कमी है, जिसके कारण रोज पुरानी फिल्मों का रीमेक सामने आ रहा है। देवदास, डान और अब शोले के साथ-साथ विक्टोरिया नं. 203 भी। हिन्दी सिनेमा में रीमेक की ऑंधी आग गई है और लगभग हर फिल्मकार के पास पुरानी क्लासिक फिल्मों का रीमेक बनाने के लिए अपने तर्क हैं। कुछ का कहना है कि वे इस तरह पुरानी फिल्म और उससे जुड़े लोगों को ट्रिब्यूट दे रहे हैं तो कुछ बेहद सादगी के साथ बताते हैं कि यह फिल्म बचपन में घर से भागकर उन्होंने 50 बार देखी थी और उससे जुड़ा प्यार उन्हें मजबूर कर रहा है रीमेक के लिए।&lt;br /&gt;फिलहाल मुझे लगता है कि मौलिक विषयों पर फिल्म बनाने में शामिल रिस्क एक बड़ा कारण है इन रीमेक फिल्मों के बनने का। मुफ्त का प्रचार किसे नहीं चाहिए, और रीमेक बनाने की घोषणा के साथ ही मीडिया आप के पीछे पड़ जायेगा, हर ओर तुलनात्मक अध्ययन और कॉपीराइट के विवादों के बीच अचानक आपकी फिल्म मशहूर हो जायेगी। बनाने वाला भी जानता है कि उसकी फिल्म पुरानी फिल्म के आगे नहीं ठहरेगी, फिर भी उसे यह जरूर पता है कि वह मुनाफा कमा लेगा। देवदास, जिसमें भव्यता के आगे प्रेम बौना साबित होता नजर आया और डान, जिसमें शाहरूख अमिताभ की गम्भीरता की तुलना में नितान्त फूहड़ नजर आये, जैसी फिल्में बॉक्स आफिस पर तगड़ा मुनाफा कमा गयी।&lt;br /&gt;अब बात यह कि रीमेक फिल्में हमें पसन्द क्यों नहीं आतीं। यह बड़ा रोचक प्रश्न है लेकिन इसका उत्तार सीधा नहीं है। अकसर रीमेक फिल्में, तकनीक, सम्पादन, ग्राफिक्स और कभी कभी अभिनय के स्तर पर भी बेहतर होती हैं फिर भी हम उन्हें पसन्द नहीं कर पाते। इसके पीछे कलाओं की समय-सापेक्षता का सिध्दान्त है (बाज़ार के तमाम दबावों के बाद भी हम यह मानते हैं कि सिनेमा आज भी एक कला-माध्यम है)। वस्तुत: किसी भी साहित्यकृति या कला-कृति जैसे संगीत, चित्र, मूर्तिशिल्प सभी के क्लासिक नमूने पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन वह अपने उन समय-अंशों में कला की सर्वाधिक सम्भव अभिव्यक्तियाँ हैं। ऐसा नहीं है कि उनमें और अधिक गुंजाइश नहीं थी लेकिन उस समय की परफेक्टनेस के लिहाज से वे सम्पूर्ण हैं। उन्हें जब भी देखा जायेगा उस समय विशेष के साथ सम्बन्धित करते हुए देखा जाएगा (ध्यान दीजिएगा यहाँ हमने तकनीक और उससे जुड़े उत्पादों की बात नहीं की है)। तो यह एक बड़ा कारण्ा है कि हम क्लासिक्स के रीमेक को स्वीकार नहीं कर पाते हैं।&lt;br /&gt;एक दूसरा बड़ा कारण हमारा खुद का नास्टैल्जिया है। मैं खुद और मुझ जैसे बहुत सारे लोग पुरानी फिल्में और चीज़ें देखते और पसन्द करते हैं। इसका एक बड़ा कारण उन चीज़ों के उत्कर्ष के समय का अपना अतीत रहता है। हम बार-बार अपने अतीत को याद करते हुए उससे जुड़ी रूमानियत और समयगन्ध को महसूस करना चाहते हैं, रीमेक्स एक तरह से अतीत की उस रूमानियत और समयगन्ध को रौंदते और नष्ट करते हैं, जो हम स्वीकार नहीं कर पाते।&lt;br /&gt;वैसे भी रीमेक्स के अलावा भी भारतीय सिनेमा में बहुत कुछ सार्थक हो रहा है, मुश्किल यह है कि उन फिल्मों के बारे में हो-हल्ला कम होता है। परजानिया, खामोश पानी, माई ब्रदर निखिल, इकबाल, डोर जैसी तमाम फिल्में इसकी उदाहरण हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-9000083114181569346?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/9000083114181569346/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=9000083114181569346' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/9000083114181569346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/9000083114181569346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='क्यों बन रहें हैं क्लासिक फिल्मों के रीमेक'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-2883449023693389647</id><published>2007-08-31T11:47:00.000-07:00</published><updated>2007-08-31T11:47:13.002-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कवि के रक्त में डुबकी लगाकर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;घबराइये नहीं यह पंक्ति मेरी नहीं है। यह पंक्ति मैंने उधार ली है अजीत चौधरी की कविता से। कविता का नाम है - 'समीक्षक जानते है', यह कविता वागर्थ के अगस्त अंक में छपी है। यह कविता मुझे जोरदार लगी। अजीत चौधरी को मैंने काफी दिनों बाद पढ़ा है, काफी पहले उनकी कुछ कविताएँ पढ़ीं थीं। यह कविता पढ़ने पर कुछ लोगों को अतिरेक से भरी हुई लग सकती है, परन्तु सच्चाई यह है कि कविता बिल्कुल सही जगहों पर सही मात्रा में चोट करती है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आज हर दूसरा आलोचक कविता में सपाटबयानी, दोहराव, परम्परा से विचलन के आरोप लगा रहा है। कुछ आलोचकों का कहना है कि कविता का आम आदमी के संघर्षों से जुड़ाव नहीं है और कवि सिर्फ संवेदना के स्तर पर कोमल अभिव्यक्तियों का सहारा ले रहे हैं तो कुछ आलोचकों का कहना है कि कवि विचारधारा के आग्रह में कुछ अधिक ही जकड़े हुए हैं, जिसके कारण यांत्रिक किस्म की प्रपोगंडा या फार्मूला कविताएँ सामने आ रही हैं। ऐसी कविताएँ नहीं लिखी जा रही हैं, मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ लेकिन ऐसा है, क्या इस बात को बार-बार दोहराना ही आलोचना या समीक्षा का प्राप्य है। क्या वस्तुनिष्ठ स्तर पर कविता में कुछ ऐसे स्थलों की पहचान होनी आवश्यक नहीं है, जिनके आधार पर कविता के लिए ऐसे प्रतिमानों पर बात की जा सके जिनसे कम से कम कविता की पहचान भाषा, शिल्प और विचार के स्तर पर एक साथ बची रहे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फिलहाल अजीत चौधरी और उनकी कविता की बात, उनकी कविता के कुछ अंश देखते हैं, जैसे देखिए-&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;वे कवि को मार सकते हैं&lt;br /&gt;उसी के शब्दों से&lt;br /&gt;उसी के बिम्ब और प्रतीकों को&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यह बड़ी महत्वपूर्ण पंक्तियाँ हैं, प्राय: ऐसा होता है कि किसी के द्वारा किसी कविता की व्याख्या सुनते समय आप वह सुनते हैं जो न आपने अपेक्षित किया होगा और न कविता लिखते समय कवि ने, आगे देखिए'&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;वे कवि के रक्त में डुबकी लगाकर&lt;br /&gt;बता सकते हैं&lt;br /&gt;किसी भी भाव और विचार का उद्गम&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;या फिर ये पंक्तियाँ -&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;घासफूस की तरह शब्दों को तापकर&lt;br /&gt;कँपकँपी भगाना वे जानते हैं&lt;br /&gt;वे कसाई की तरह कुछ शब्दों के कद छाँट सकते हैं&lt;br /&gt;बड़ी निर्ममता से&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आगे यह कविता अपने विस्तार में चलकर थोड़ा भटक भी जाती है, जहाँ आलोचक नाम के जीव पर कुछ व्यक्तिगत किस्म के प्रहार किये गये हैं, उन स्थलों पर मैं कवि से सहमत नहीं हूँ, लेकिन कविता की प्रारम्भिक पंक्तियाँ बहुत अच्छी हैं। वाकई हर नये कवि को इसे पढ़ना चाहिए और साथ-साथ हर नये और पुराने आलोचक को भी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अपने सभी आलोचक-समीक्षक मित्रों से अपनी और अजीत चौधरी की ओर से क्षमा-याचना सहित।&lt;br /&gt;(आपको याद होगी अष्टभुजा शुक्ल की ''भज आलोचक ........'') &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-2883449023693389647?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/2883449023693389647/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=2883449023693389647' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/2883449023693389647'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/2883449023693389647'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post_31.html' title='कवि के रक्त में डुबकी लगाकर'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-5911768460077842159</id><published>2007-08-18T21:39:00.001-07:00</published><updated>2007-08-18T21:39:59.733-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>वो आई</title><content type='html'>&lt;a title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" href="http://www.chitthajagat.in/?claim=udipeuoflbgw"&gt;&lt;img title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो आई&lt;br /&gt;उसके आने ने जैसे&lt;br /&gt;रात के आसमान में फेंका कंकड़&lt;br /&gt;खिड़की के आकाश में&lt;br /&gt;पहले चाँद थरथराया&lt;br /&gt;फिर जल काँपा आसमान का&lt;br /&gt;फिर एक एक करके झिलमिलाये तारे&lt;br /&gt;सबने कहा देखो वो आई&lt;br /&gt;उसके आने से जागा मेरे कमरे का ऍंधेरा&lt;br /&gt;उसकी तांबई रंगत से खुश हुआ दरवाजा&lt;br /&gt;खुश हुए मेरे गन्दे कपड़े और जुराबें&lt;br /&gt;खिल उठीं बेतरतीब किताबें&lt;br /&gt;सब खुसफुसाये ... वो आई&lt;br /&gt;वो आई मेरे मनपसन्द पीले कपड़ों में&lt;br /&gt;जिनके हरेक तन्तु की गन्ध मुझे परिचित&lt;br /&gt;मैंने जैसे कपड़ों से कहा - बैठो&lt;br /&gt;कपड़े बैठे ... वो बैठी&lt;br /&gt;जैसा कि उसकी आदत है, उसने कहा&lt;br /&gt;कि मन नहीं लगता मेरे बिना उसका&lt;br /&gt;जीना असम्भव है&lt;br /&gt;उसने कहा ... मैंने सुना&lt;br /&gt;फिर&lt;br /&gt;मैंने कहा - बीत गया है अब सब कुछ&lt;br /&gt;मैंने कहा ... उसने सुना&lt;br /&gt;उसने कहा - बीतना भूलना नहीं होता&lt;br /&gt;दर्द को सम्मिलित करना होता है जीवन में&lt;br /&gt;मैंने कहा दर्द .. हाँ दर्द कहाँ बीतता है&lt;br /&gt;सिर्फ हम बीतते हैं थोड़ा-थोड़ा समय के साथ&lt;br /&gt;वह थोड़ा और उदास हुई&lt;br /&gt;गीली हो गईं उसकी ऑंखें&lt;br /&gt;आखिर वह उठी&lt;br /&gt;मैंने उठते हुए देखा पीले कपड़ों को&lt;br /&gt;मैंने देखा पीले कपड़ों को जाते हुए&lt;br /&gt;काँपना बन्द हुआ आसमान का&lt;br /&gt;सो गया फिर से कमरे का ऍंधेरा&lt;br /&gt;दुखी हुए कपड़े और जुराबें&lt;br /&gt;दुखी हुआ दरवाजा&lt;br /&gt;इस बार&lt;br /&gt;सब जैसे चीखकर बोले&lt;br /&gt;वो गई .... वो गई .... वो गई&lt;br /&gt;मैंने सिगरेट सुलगाई&lt;br /&gt;और आहिस्ते से कहा&lt;br /&gt;जाने दो&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-5911768460077842159?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/5911768460077842159/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=5911768460077842159' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5911768460077842159'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5911768460077842159'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post_18.html' title='वो आई'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-7942051689374949011</id><published>2007-08-17T21:21:00.000-07:00</published><updated>2007-08-17T21:21:04.360-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मार्खेज़'/><title type='text'>वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;आप सोचेंगे मार्खेज़ को अचानक याद करने का मतलब? लेकिन हुआ यूँ कि हाल में ही मार्खेज़ का प्लीनीयो मेन्दोज़ा द्वारा लिया गया साक्षात्कार पढ़ा तो खुद को लिखने से रोक नहीं सका। गद्य के जादू को अगर महसूस करना है तो इस उपन्यास को पढ़ें, यह एक ऐसा उपन्यास है जो वृहत होने के बावजूद आपको एक भी पृष्ठ छोड़ने की स्वतंत्रता नहीं देता। पहले-पहल जब जादुई यथार्थवाद के बारे में सुना या पढ़ा था तो इस फ्रेज़ के इस्तेमाल पर खुद को पर चकराने से नहीं रोक सका था, पर उपन्यास पढ़ने के बाद समझ में आया कि वाकई ऐसा भी कुछ सम्भव है। एक साथ अथाह और उदात्त सौन्दर्य के साथ महान वीभत्सता और क्रूरता इस आख्यान में ही सम्भव है। मेल्कीयादेस और अन्य बंजारों के चमत्कारों से लेकर फर्नान्दा का धार्मिक आचरण जो सिर्फ सोने की राजचिह्न वाली चिलमची में शौच करती है, यह सभी कुछ अकल्पनीय है, लेकिन फिर भी मार्खेज़ उसे इतिहास की तरह लिखते हैं और मजबूर करते हैं कि उस पर विश्वास किया जाए। मार्खेज़ ने साक्षात्कार में कहा है कि ''मैं मज़े के लिए लिखने के जाल में फँसा और उसके बाद असल में जहाँ मैंने पाया कि दुनिया में लिखने से अधिक प्रिय मुझे कुछ नहीं था।'' यह बात बड़ी महत्तवपूर्ण है कि एक लेखक जो मज़े के लिए लिखना शुरू करता है उसकी कृति एक बड़े और विस्तृत औपनिवेशिक इतिहास और सांस्कृतिक विमर्श के फलक तक पहुँचती है। मैंने पढ़ते समय यह हमेशा महसूस किया है कि एक ऐसी कृति जो आपको अपने साथ अपने संसार, अपने समय में साथ ले जाती है, वह अनूठी होती है। गाबो (मार्खेज़ का दूसरा नाम) को पढ़ते हुए आपको ऐसा लगेगा कि आप माकोन्दो में ही रह रहे हैं। ओरैलियानो बुएनदीया के उधमी (और उद्यमी भी) परिवार वाले और स्वेटर बुनती हुई उर्सुला का प्रतीक ऐसा चुम्बकीय है कि उपन्यास खत्म होने के बाद माकोन्दो छोड़ते हुए दुख सा होता है। अलग होते हुए भी उपन्यास का संसार इतना यथार्थ बुनता है कि रूपवती रेमेदियोस के स्वर्गारोहण का जादू भी असत्य नहीं लगता। सिर्फ वक्त काटने के लिए कर्नल औरेलियानो का सुनहरी मछलियाँ बनाना और बाद में उन्हें गला देना, ये कुछ ऐसे विवरण हैं, जो आपको फंतासी के करीब लगेंगे लेकिन विश्वास मानिये मार्खेज़ को फंतासी से वितृष्णा है, वे कहते हैं, ''सादा फंतासी जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं होता, मुझे बेहद नापसंद है ..... कल्पना और फंतासी के बीच वहीं अंतर है जो एक मनुष्य और वेन्ट्रिलोकिट के पुतले में होता है।''&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;उपन्यास की विशेषताओं के अतिरिक्त कुछ ख़ास बातें मार्खेज़ की निजी लेखन शैली के बारे में भी बड़ी रोचक हैं, जैसे इस उपन्यास के बारे में सोचने में उन्हें पन्द्रह साल लगे और अन्त में लगभग दो सालों में उन्होंने इसे लिखा। उनके अनुसार अगर कोई विचार पन्द्रह साल से तीस साल तक टिका रह सकता है तो उसे लिखने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं। मार्खेज कहते हैं कि उन्हें सुबह रेगिस्तान के द्वीप की चाहिए और रात एक बड़े शहर की जहाँ कुछ अच्छी ड्रिंक्स और दोस्त मिल सकें। लिखते समय वे आश्चर्यजनक रूप से बहुत सारे पन्ने फाड़ते हैं और उन्हें लगता है कि टाइप करते समय उनसे हुई गलती रचनात्मक निर्णय की गलती के बराबर होती है। मार्खेज़ के अनुसार वे बहुत किस्मत वाले हुए तो पूरे दिन में एक पैराग्राफ लिख पाते हैं। मजेदार बात यह कि मार्खेज़ कभी कभी लिखते हुए अचानक लिखने की अवस्था से बाहर आ जाते हैं और ऐसे समय में वे पेंचकस लेकर घर भर के ताले और प्लग ठीक करने लगते हैं या दरवाज़ों पर हरा रंग करते हैं। वस्तुत: यह खुद को री-सेट करने जैसी प्रक्रिया होती है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;यूँ तो यह उपन्यास और मार्खेज़ से जुड़ी हर बात रोचक और मज़ेदार है, लेकिन मेरी संस्तुति यह है कि हर गद्य लेखक को ज़रूरी तौर से मार्खेज़ को अवश्य पढ़ना चाहिए। गद्य का प्रवाह, बाँधे रखने की कला और यथार्थ को रोचक स्वरूप में विन्यस्त कर प्रस्तुत करना वहाँ से सीखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-7942051689374949011?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/7942051689374949011/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=7942051689374949011' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7942051689374949011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7942051689374949011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-1134827169551731222</id><published>2007-07-29T08:11:00.000-07:00</published><updated>2007-07-29T08:11:17.865-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>मित्र</title><content type='html'>मित्र थे&lt;br /&gt;जो चुनते थे&lt;br /&gt;शर्ट की आस्तीन से अदृश्य भुनगे&lt;br /&gt;कन्धे से साफ़ करते थे धूल&lt;br /&gt;ख्याल से भरकर छूते थे माथा&lt;br /&gt;ध्यान रखते थे मित्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झूठ बोलकर बचाते थे मित्र&lt;br /&gt;क्रूर शिक्षक और क्रुध्द पिता से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्र थे&lt;br /&gt;जिन्होंने सिखाया प्रेम करना&lt;br /&gt;जो हमें चौराहों पर मिलते थे&lt;br /&gt;जिनसे गलबहियाँ कर घूरते थे हम&lt;br /&gt;शहर की सुन्दर लड़कियों का दुपट्टा&lt;br /&gt;और अकसर पीछा करते थे&lt;br /&gt;गुलाबी हुड वाले रिक्शों का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्र थे&lt;br /&gt;जो हमें दूर ले गये वर्जनाओं से&lt;br /&gt;जिनके साथ सीखा सिगरेट पीने का हुनर&lt;br /&gt;जिनके साथ हाइवे ढाबों पर छुपकर शराब पी&lt;br /&gt;देखीं उनके साथ तमाम मसाला फिल्में&lt;br /&gt;बहुत मौज की जिनके साथ हमने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्र थे&lt;br /&gt;जिन्होंने सिखाया क्रोध करना&lt;br /&gt;जिनके लिए हम दूसरों से लड़े और वे हमारे लिए&lt;br /&gt;मित्रों ने छीनी भी प्रेमिकाएँ&lt;br /&gt;तब जी भर कर गरियाया हमने उन्हें&lt;br /&gt;बदले में हुआ बेशुमार गालियों का विनिमय&lt;br /&gt;अद्भुत विरेचक थे हमारे मित्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी ज़रूरत थे मित्र&lt;br /&gt;बहन की शादी कैसे होती उनके बिना&lt;br /&gt;कैसे होता दादी का अन्तिम संस्कार&lt;br /&gt;माँ की बीमारी में साथ दिया उन्होंने&lt;br /&gt;पहली नौकरी पर स्टेशन छोड़ने गए मित्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा जीवन थे मित्र&lt;br /&gt;जब गले से लगते थे&lt;br /&gt;तो जीवन मित्रता से पोसा हुआ लगता था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दूर हैं मित्र&lt;br /&gt;मिलते हैं इंटरनेट के चैटरूमों में&lt;br /&gt;या फोन पर बाँटते हैं दुख दर्द&lt;br /&gt;पर ऐसे उनके गले नहीं लगा जा सकता&lt;br /&gt;नहीं जमाया जा सकता है धौल&lt;br /&gt;उनकी पीठ पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह मित्रता अब भी&lt;br /&gt;बची हुई है हमारे जीवन में&lt;br /&gt;पर जीवनाधार वो&lt;br /&gt;मादक यारबाशियाँ नहीं हैं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-1134827169551731222?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/1134827169551731222/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=1134827169551731222' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/1134827169551731222'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/1134827169551731222'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/07/blog-post_29.html' title='मित्र'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-5366683654440293991</id><published>2007-07-16T23:18:00.002-07:00</published><updated>2007-07-16T23:18:38.155-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>विस्लावा शिम्बोर्स्का की कविताएँ</title><content type='html'>(अनुवाद : विशाल श्रीवास्तव)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;तीन मुश्किल शब्द&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं बोलती हूँ एक शब्द : भविष्य&lt;br /&gt;तो पहले अक्षर जुड़ते हैं बीते हुए समय से&lt;br /&gt;जब मैं बोलती हूँ खामोशी&lt;br /&gt;मैं इसे नष्ट करती हूँ&lt;br /&gt;जब मैं कहती हूँ कुछ नहीं&lt;br /&gt;मैं कुछ ऐसा बनाती हूँ&lt;br /&gt;जिसे कोई अपने हाथों में नहीं रख सकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;एक नोट&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जीवन एक अकेला रास्ता है -&lt;br /&gt;पत्तियों के आश्रय में बचे रहने का&lt;br /&gt;ढूँढने का अपनी सांसे रेत में&lt;br /&gt;अपने डैनों पर ऊँचे उठने का&lt;br /&gt;एक प्यारा कुत्ता होने का&lt;br /&gt;या इसके गर्म फर को थपथपाने का&lt;br /&gt;घटनाओं के भीतर&lt;br /&gt;विलम्बित विचारों को निचोड़ने का&lt;br /&gt;और खोजने का&lt;br /&gt;सारी सम्भाव्य गलतियों की न्यूनता को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन एक अकेला रास्ता है-&lt;br /&gt;एक असाधारण मौका है&lt;br /&gt;एक क्षण के लिए याद करने का&lt;br /&gt;बुझे हुए दिये के साथ हुई बातचीत को&lt;br /&gt;और केवल एकबार के लिए ही सही&lt;br /&gt;एक पत्थर से फिसलते हुए&lt;br /&gt;पहली या दूसरी ज़ोरदार बारिश में भीगने का&lt;br /&gt;खो देने का हरी घास के बीच अपनी चाभियाँ&lt;br /&gt;और अपनी ऑंखों से हवा के बीच&lt;br /&gt;चमक का पीछा करने का&lt;br /&gt;और अनजान बने रहने का&lt;br /&gt;कुछ बहुत ज़रूरी चीज़ों से&lt;br /&gt;जीवन एक अकेला रास्ता है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-5366683654440293991?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/5366683654440293991/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=5366683654440293991' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5366683654440293991'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/5366683654440293991'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/07/blog-post_16.html' title='विस्लावा शिम्बोर्स्का की कविताएँ'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-629234329945627035</id><published>2007-07-05T08:23:00.002-07:00</published><updated>2007-07-05T08:23:57.592-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>ताज़ा कविता</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अपभ्रंश में हँसता हुआ आदमी&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मॉल के भीतर खड़ा वह आदमी&lt;br /&gt;निखालिस अपभ्रंश में हँस रहा था&lt;br /&gt;और जब हिन्दी की काया में प्रवेश कर गई हों&lt;br /&gt;तमाम भाषाओं की संक्रामक आत्माएँ&lt;br /&gt;और चमक गया हो उसका चोला&lt;br /&gt;इतना बड़ा बाज़ार चलता हो उसके सहारे&lt;br /&gt;भयानक है न किसी का अपभ्रंश में हँसना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य की नींद में थे आस-पास के लोग&lt;br /&gt;और वह आनन्द के जागरण में था&lt;br /&gt;बेतरतीब दाढ़ी वाला वह आदमी&lt;br /&gt;पूरी तरतीब से बना रहा था अपनी खैनी&lt;br /&gt;वह उसी तरह खिला हुआ था और गन्ध से भरा&lt;br /&gt;बादशाह की तरह जैसे प्याज रहता है&lt;br /&gt;नव्यतम व्यंजनों के बीच भी अपने पूरे ठाठ से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सहमते हुए पूछा उससे&lt;br /&gt;बाबा सुनो यह कैसे कर सकते हो तुम&lt;br /&gt;हँसे जा रहे हो अपभ्रंश में&lt;br /&gt;ज़रा तो मान रखो इस सलीके भरी जगह का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी जैसे स्थगित हो गया उसका हास&lt;br /&gt;कोटरों में धंसी उसकी ऑंखों में दिखी&lt;br /&gt;उसके गाँव से आने वाली सड़क&lt;br /&gt;जो अब सिर्फ उसके गाँव से शहर को आती है&lt;br /&gt;लौटती नहीं है उसके गाँव को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने नहीं कहा&lt;br /&gt;कहा जैसे उसके मौन ने&lt;br /&gt;मैं जानता हूँ भाई&lt;br /&gt;भला इस समय में कहाँ पोसाएगी मेरी यह खैनी&lt;br /&gt;मेरा यह काला छाता और यह चमरौंधा जूता&lt;br /&gt;खेती-किसानी, चैती, फाग और मेला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भव्यता से भरे जीवन में&lt;br /&gt;कहाँ टिकेगा यह इतिहास का कबाड़&lt;br /&gt;तो मैं आठवीं सदी में लौट रहा हूँ&lt;br /&gt;लेकर इन सारी चीज़ों को&lt;br /&gt;और इसीलिए निधड़क हँस रहा था अपभ्रंश में&lt;br /&gt;सम्भालो तुम अपनी चमकती हुई हिन्दी&lt;br /&gt;और अपना दमकता हुआ बाज़ार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगा कि जैसे नंगा खड़ा हूँ बाजार में&lt;br /&gt;वहीं वह आदमी बेशर्म&lt;br /&gt;लौटते हुए अवधी में रोने लगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;                                                                             - विशाल श्रीवास्तव&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-629234329945627035?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/629234329945627035/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=629234329945627035' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/629234329945627035'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/629234329945627035'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='ताज़ा कविता'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-2315747384036911930</id><published>2007-06-23T02:51:00.001-07:00</published><updated>2007-06-23T02:51:19.346-07:00</updated><title type='text'>भारतीय साम्यवाद के शिल्पी पी. सी. जोशी</title><content type='html'>भारतीय साम्यवादी आन्दोलन के बारे में यह आम मध्यवर्गीय समझ है कि अत्यन्त जनोन्मुख होते हुए भी यह सही अर्थों में भारतीय नहीं बन सका। अर्थात् यह एक नितान्त राजनीतिक आन्दोलन बना रहा, उसमें भी एक ऐसा आन्दोलन जिसमें अपने माक्र्सवाद या माक्र्सवाद-लेनिनवाद को न केवल भारतीय शब्दावली में ढालने से परहेज किया, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी प्रेरणा लेने से इन्कार किया। भारत की सांस्कृतिक जड़ों को इसने दकियानूस और प्रतिक्रियावादी मानकर इनकी कटु आलोचना की या अप्रासंगिक मानकर इनके प्रति उदासीन रहा। महावीर और गौतम की विराट करुणा और सामाजिक चिन्ता, उपनिषदों की बौध्दिकता और मध्ययुगीन वैष्णव चेतना के सामाजिक प्रयासों तथा अपने समकालीन गांधी तक का सही मूल्यांकन करने में यह लगभग असफल रहा। स्वयं पी.सी. जोशी का, जो 1935 से 1947 तक के चुनौतीपूर्ण वर्षों के दौरान राष्ट्रीय महासचिव रहे, और जिन्होंने आन्दोलन को केवल बचाया ही नहीं बल्कि लोकप्रिय भी बनाया हो, पार्टी के भीतर दरकिनार होते जाना और लगभग अनजान मर जाना भी इसके सत्ता सरोकार की केन्द्रीयता का बोधक लगता है। आश्चर्य नहीं, अपनी ईमानदार राष्ट्रीय निष्ठा, त्याग और बलिदान तथा असंदिग्ध जनोन्मुखता के बावजूद यह उस भारतीय मध्यवर्ग की मुख्यधारा से कटा रहा जो राष्ट्रीय चित्तिा का प्रतिनिधि और पुरोहित हुआ करता है।&lt;br /&gt;यूँ तो कलकत्ता में मेरा कम्युनिस्ट आन्दोलन से संस्पर्शीय लगाव सन् 1959-60 से ही था, लेकिन गाजीपुर आने के बाद 1974 में ही मैं पहली बार भारतीय कम्युनिस्ठ पार्टी का सदस्य बना था और पार्टी की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों का निर्वाह करता लगभग 1990 तक सदस्य बना रहा। लेकिन सोवियत संघ के विघटन और फिर मण्डल आयोग के बाद पार्टी मित्रों में पनपे सामाजिक भटकाव ने मुझे पस्तहिम्मत किया, कई रात नींद नहीं आयी और मुझे लगता कि विगत लगभग 30 वर्षों से मैं साम्यवाद के नाम पर एक सपना-मात्र पाले हुए था, हमारी वैज्ञानिक दृष्टि और इतिहास-बोध सम्बन्धी हमारे सारे दावों में कोई आधारभूत कमजोरी थी। फिर भी अभी वैचारिक लगाव कायम है, क्योंकि सोवियत प्रयोग की असफलता के बाद भी ऐसा कोई सामाजिक बोध और इतिहास-दृष्टि सामने नहीं है जो इसका विश्वसनीय विकल्प लगती हो।&lt;br /&gt;मैंने पी.सी. जोशी को कभी देखा नहीं है, वैसे प्रकाशित चित्रों में उनके चेहरे से शालीनता, मासूमियत, ईमानदारी और निष्ठा का भाव टपकता है। कामरेडशिप के दिनों, लगभग हर शाम, हम कई-एक कामरेड, पूर्वांचल के लोकप्रिय कम्युनिस्ट नेता सरजू पाण्डेय के आवास पर इकट्ठे होते और तमाम गम्भीर-हँसोड़ चर्चाओं के दौरान यदा-कदा पी.सी. जोशी की चर्चा भी पाण्डेय जी करते। यह बताते कि कलकत्ताा में 1948 की पार्टी कान्फ्रेंस में कामरेड जोशी अलग-थलग पड़ गये थे। वह स्टेज पर दर किनार एक कोने में उदास बैठे दिखते, उनकी नीतियों क विरुध्द लम्बे-लम्बे उग्र भाषण दिये जाते, और सामने बैठे श्रोता-कामरेडों के बीच से रह-रह कर आवाज उठती-'हैंग, हैंग कामरेड जोशी', अर्थात् 'कामरेड जोशी को फाँसी दो, फाँसी दो।' वह रणदिवेवादी उग्रता का दौर था, और उस समय पी.सी. जोशी द्वारा 15 अगस्त, 1947 को 'राजनीतिक आजादी' का दिन बताया जाना और आर्थिक एवं अन्य स्वतंत्रताओं क लिए स्थापित अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय बुर्जुआ तथा सामन्ती गठजोड़ की सत्ता के साथ दृढ़ 'एकता और संघर्ष' की नीति की वकालत किया जाना उस सत्ता का दलाल होना था। वह दौर वैचारिक उद्वेलन और आन्दोलन प्रयोगों का दौर था। स्थापित सत्ताा के स्वरूप एवं वर्ग चरित्र को लेकर बावेला था। 1948 से 1951 तक रणदिवे की 'मास्को लाइन' चली और 1951-55 तक राजेश्वर राव को 'चाइना लाइन'। इनके बीच जोशी की भारतीय लाइन के लिए कोई जगह नहीं थी। इसलिए अपनी लाइन पर टिके रहने के लिए उन्हें पार्टी से निष्कासित तक किया गया। लेकिन एक-एक करके दोनों लाइनें प्रयोग में ध्वस्त हो गयीं, क्योंकि भारत, रूस अथवा चीन नहीं था। अन्तत: 1955 में अजय घोष, जो भगत सिंह के साथियों में से थे, के महासचिव बनने के बाद पार्टी के भीतर अस्थायी सन्तुलन आया, 1956 में जोशी पुन: पार्टी के सदस्य बना लिए गये, और सोवियत सिध्दान्तकारों के हस्तक्षेप से भारतीय सत्ताा के वर्ग-चित्रण को लेकर गम्भीर पुनर्चिन्तन की आवश्यकता महसूस हुई। इस प्रकार परिस्थितियों ने पी.सी. जोशी को सही ठहराया। लेकिन 1959 में उभरे चीन और भारत के बीच सीमा विवाद और 1962 में चीन-भारत युध्द ने पार्टी के आन्तरिक कलह को फिर से उभार दिया जिसकी चरम सीमा परिणति 1964 में पार्टी के साथ-साथ कम्युनिस्ट आन्दोलन के विभाजन के रूप में हुई। 1948 से 1964 तक के आन्तरिक कलह के दौरान पी.सी. जोशी कभी कोई पहल करते नहीं दिखते। अब मसला डाँगे-राजेश्वर राव-मोहित बनाम रणदिवे-सुन्दरैया-गोपालन के बीच था। 1948 में दरकिनार होने के बाद पी.सी. जोशी कभी कम्युनिस्ट आन्दोलन के रंगमंच पर नहीं दिखे, यद्यपि उन्होंने नींव की मजबूत ईंट का काम किया। शायद आन्दोलनों के पास वैयक्तिक स्मृतियों के लिए कोई जगह नहीं होती। इनके केन्द्र में मुद्दे, विचारधारा और सांगठनिक सरोकार होते हैं, बीती व्यक्तिगत स्मृतियाँ नहीं। इसी माने में आन्दोलन निर्वैयक्तिक और निर्मम हुआ करते हैं।&lt;br /&gt;पी.सी. जोशी सांस्कृतिक और अकादमिक रुचि के भी आदमी थे। पार्टी द्वारा दरकिनार किये जाने पर वह अपने अकादमिक सरोकारों से जुड़ गये। पी.पी.एच. ने 1857 के शताब्दी वर्ष 1957 में जो मेमोरियल वाल्यूम प्रकाशित किया था उसमें पी.सी. जोशी के दो निबन्ध हैं जो उनकी अकादमिक रुचि, विस्तार और गांभीर्य के द्योतक हैं। उसी वर्ष उन्होंने 1857 पर लोकगीतों का एक संग्रह प्रकाशित किया था जिसे मैंने अभी तक पढ़ा नहीं है, लेकिन उनकी भूमिका पर प्रशंसात्मक प्रेक्षण जरूर पढ़ने को मिले हैं। अपने महामन्त्रित्व के दौरान उन्होंने गांधी और नरेन्द्रदेव से पत्राचार किया था जो प्रकाशित है और भारतीय परिप्रेक्ष्य में कम्युनिस्ट आन्दोलन सम्बन्धी उनकी चिन्ताओं पर रोशनी डालता है। बदलते भारतीय सन्दर्भों में वह अपने आन्दोलन का विस्तार चाहते थे और इसके लिए सोवियत और चीनी अनुभवों को महत्वपूर्ण मानते हुए भी भारतीय परिवेश में उन्हें अक्षरश: प्रासंगिक नहीं मानते थे। वह सर्जनात्मक माक्र्सवादी थे। उन्होंने उसी दौर में हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक खतरे को भाँप लिया था और वह नेहरूवादी धर्म निरपेक्षता के समर्थक थे। इस सन्दर्भ में उन्हें समाजवादियों से भी कोई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि 1957 में जब लोहिया जवाहर लाल नेहरू के विरुध्द चुनाव लड़ रहे थे तो संघ परिवार ने हिन्दुत्ववादी करपात्री जी का समर्थन न कर लोहिया का समर्थन किया था। हाल वर्षों में इन्हें समाजवादियों से सांठ-गांठ करते जनसंघ भाजपा की राष्ट्रीय क्षितिज पर अन्तत: असरदार उपस्थिति बनी। कहा जा सकता है कि 1948-54 के कम्युनिस्ट संकीर्णवाद का ही परिणाम था कि दौर में समूचा आन्दोलन कांग्रेस-विरोधी दक्षिणपंथी मुहिम का समर्थक बना जिससे हिन्दू साम्प्रदायिकता को बल मिला। पी.सी. जोशी को अन्तत: इतिहास ने सही साबित किया है। एक दौर में जो लोग पी.सी. जोशी को 'दलाल' और हैंग, हैंग' कह रहे थे। आज वह भी अपने साम्प्रदायिकता-विरोधी अभियान में कांग्रेस के साथ हैं। डाँगे और जोशी सही थे, लेकिन डाँगे साहब तरीके अतिरेकी होकर अप्रासंगिक हो गए, और जोशी ने अकादमिक रास्ता पकड़कर अपने को सक्रिय राजनीति की दृष्टि से अप्रासंगिक बना लिया।&lt;br /&gt;अन्तिम दिनों में वह जे.एन.यू. से जुड़ गये थे ओर वहीं पी.सी. जोशी आर्काइव को समृध्द बनाने में लगे थे। शायद अब स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। 7वें दशक के उत्तारार्ध्द और आठवें दशक में मैं जब कभी भी जे.एन.यू. जाता, जोशी आर्काइव मैं जरूर जाता। उसे मैंने हमेशा खाली और उदास पाया। वहाँ मिलने की हसरत भी कभी पूरी नहीं हुई। अक्सर सूचना मिलती कि तबीयत ठीक नहीं चल रहीं है। अन्तत: 1980 में 9 नवम्बर का उनका इन्तकाल हो गया और शायद ही किसी अखबार में उनके मरने की सूचना प्रकाशित हुई हो। कम्युनिस्ट पार्टियों की प्रतिक्रिया भी दबी-दबी और सूचनात्मक थी। आज आत्ममुग्ध सी.पी.एम. क्या कर रही है नहीं जानता, लेकिन सी.पी.आई. को धन्यवाद देना चाहूँगा जिसने अपने भूले-बिखरे एक दौर के योध्दा को उसके जन्म-शताब्दी वर्ष में राष्ट्रीय स्तर पर याद करने के विवेक का परिचय दिया है। कतिपय प्रबुध्द लोगों से अक्सर सुनता भी हूँ कि सी.पी.एम. अधिक व्यवहारपरस्त और राजनीतिक है, तथा सी.पी.आई. अधिक विचारधारात्मक और सांस्कृतिक।&lt;br /&gt;पूछा जा सकता है कि पी.सी. जोशी का कम्युनिस्ट आन्दोलन को अवदान क्या है ? यही प्रश्न श्रीपाद अमृत डाँगे के बारे में भी उठाया जा सकता है। जो आन्दोलन की पहली पीढ़ी के शीर्षस्थ मनीषियों में थे निकी पुस्तक 'गान्धी एण्ड लेनिन' 1921 में प्रकाशित हुई थी जो लेखक के युवा-उत्साह के बावजूद गांधी ओर उनके आन्दोलन का वस्तुगत आंकलन प्रस्तुत करती है। डाँगे की दूसरी महत्तवपूर्ण पुस्तक भारत : आदिम साम्यवाद से दासप्रथा तक भौतिकवादी इतिहास-लेखन की दृष्टि से एक महत्तवपूर्ण प्रस्थान बिन्दु है जिसमें ऋग्वेद से लेकर महाभारत काल तक भारतीय समाज के विकास और उसकी धार्मिक सांस्कृतिक प्रथाओं एवं प्रतीकों की मौलिक व्याख्या प्रस्तुत की गयी। पी.सी.जोशी ने डाँगे साहब की इस दृष्टि को सांगठनिक विस्तार दिया और इस प्रकार यह आम शिक्षित-अशिक्षित चेतना तक पहुँच सकी। ध्यातव्य है कि सत्यभक्त] गोकुल जी आदि द्वारा कानपुर में 1952 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और गठन के साथ ही पार्टी प्रतिबन्धित कर दी गयी और जन्म से लेकर 1943 तक यह एक अंडरग्राउन्ड संगठन के रूप में काम करती रही। इसके बहुत सारे सदस्य ट्रेड यूनियनों, किसानों सभाओं, कांग्रेस समाजवादी पार्टी और कांग्रेस तक के मंचों से सक्रिय रहे और इन्हें अन्दर से रैडिकलाइज करने की कोशिश करते रहे। 1935 में पी.सी. जोशी को इसी अण्डरग्राउण्ड पार्टी के महासचिव का दायित्व सौंपा गया था, प्रगतिशील लेखक संघ, इण्डियन पीपुल्स थियेटर (इप्टा), 'सांस्कृतिक दस्तों' जैसे संगठनों के निर्माण में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई और कम्युनिस्ट कार्यकत्तर्ााओं को सांस्कृतिक आयामों के प्रति संवेदनशील बनाया। इस संवेदनशीलता के अभाव में कोई भी आन्दोलन 'राष्ट्रीय' नहीं हो सकता। आदमी के सरोकार केवल रोजी-रोटी और राजनीतिक सत्ताा के सरोकार नहीं होते। इन संगठनों ने बड़े-बड़े विचारकों, रचनाकारों, रंगकर्मियों और फिल्मकारों को आकर्षित किया। जिनसे प्रेमचन्द, रवीन्द्रनाथ, जवाहरलाल नेहरू, ए.के. हंगल, के. ए., अब्बास, सरोजनी नायडू, अमृतलाल नागर, राहुल, यशपाल, मामा बरेरकर, बलराज साहनी, कैफी आजमी, रामविलास, नामवर, भीष्म साहनी आदि प्रत्यक्षत: अथवा परोक्षत: जुड़े रहे। बहुत सारे रंगकर्मी लेखक, रचनाकार, फिल्मी कलाकार और निर्देशक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने, और अपनी प्रतिबन्धित स्थिति में भी पार्टी की सदस्यता 90,000 तक पहुँच गयी थी। ऐसा तब था जब सदस्यता खूब जाँच-परख कर दी जाती थी। लेकिन 1948 में रणदिवेवादियों के 'सर्वहाराकरण' के उन्माद ने पार्टी के मध्यवर्ग से लगभग काट दिया और पार्टी 'मास्को लाइन और 'चाइना लाइन' की शिकार बनी, ओर यह रोग आन्दोलन के किसी न किसी अंग को आज भी दूषित किये हुए है।&lt;br /&gt;विद्यासागर नौटियाल के मानें तो पी.सी. जोशी में अपने छोटे से छोटे साथियों को आत्मीय संस्पर्श देने की अद्भुत क्षमता थी और साथ ही किसी को सच्चे कम्युनिस्ट में रूपान्तरित कर देने की भी-'उन्होंने बहुत कम पढ़े-लिखे मजदूर मजदूर नेता सनत सिंह को मौलाना युसफ में तब्दील कर दिया।' राहुल जी की मानें तो 1930 के पेशावर के वीर नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली को, कांग्रेस द्वारा अपमानित किये जाने बाद, कम्युनिस्ट साहित्य पढ़वा-समझा कर उन्हें न केवल मजदूरों और किसानों को बड़ा नेता बना डाला बल्कि रायल सेना के जवानों तक को प्रभावित किया। 1946 का नाविक विद्रोह के बाद अंग्रेजों को 1857 याद आया होगा और वे समझ गये होंगे कि सैनिक असंतोष एवं विद्रोह दूसरे आघात को वे सह नहीं सकेंगे। इसी समझ के नाते उन्हें भारत को स्वाधीन करने की प्रक्रिया आरम्भ करनी पड़ी और वे कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग नेताओं से बात-चीत करने लगे। 1946 की घटना के बाद वाइसरॉय वैवेल ने अपने कैबुल में भारत में बालशेविक प्रकार की क्रान्तिका अन्देशा व्यक्त किया था और किसी नयी राजनीतिक पहल की सलाह दी थी। 1857, 1921-22, 1930-31, 1942 और 1946 की पीठिका में ही भारतीय स्वाधीनता के समय एवं स्वरूप को समझा जा सकता है और इसी सन्दर्भ में पी.सी. जोशी सांगठनिक क्रान्तिकारी अवदान को भी। यह भूलना कृतघ्नता होगी कि उन्होंने दरकिनार कम्युनिस्ट आन्दोलन को राष्ट्रीय मुख्यधारा में ला खड़ा किया था।&lt;br /&gt;बुध्दिधर्मी कम्युनिस्ट पत्रकार सुब्रत बनर्जी जो आजीवन पी.सी. जोशी के प्रति वफादार बने रहे, लिखते है कि पी.सी. जोशी के प्रति वफादार बने रहे, लिखते हैं कि पी.सी. जोशी अपने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को अत्यन्त सर्जनात्मक सलाह देते। वह प्रत्येक से कहते कि वह जहाँ कहीं भी हो उसे सर्वोत्ताम बनने का प्रयास करते रहना चाहिए-कार्यालय में सर्वोत्ताम कार्यकत्तर्ाा, शिक्षण संस्था में सर्वोत्ताम छात्र, अगर स्वाधीनता सेनानी है तो सर्वोत्ताम स्वाधीनता सेनानी, इत्यादि। जब तक वह सर्वोत्ताम होने का प्रयास नहीं करता रहता तब तक वह दूसरों के सम्मान और वफादारी का हकदार नहीं हो सकता। वह यह भी कहते रहते कि अपने इतिहास, संस्कृति और सभ्यता का जो प्रगतिशील पहलू है उसको सामने लाना चाहिए, और इसके लिए वर्तमान के साथ-साथ जटिल भारतीय अतीत का भी निष्ठापूर्वक अध्ययन करना चाहिए। वह लोकभाषा और लोक संस्कृति के प्रबल पक्षकार थे और हमेशा कहते है कि कम्युनिस्टों को जनता की भाषा में बात करनी चाहिए। तभी वे उसका विश्वास अर्जित कर उसका प्रबोधन भी कर सकते हैं। उनके पास भारतीय समाज और संस्कृति की बहुलता की स्पष्ट एवं स्वस्थ समझ थी, और वह हर प्रकार की संकीर्ण साम्प्रदायिक दृष्टि के विरोधी थे। वह कहते हैं बहुत महत्तवपूर्ण नहीं, महत्तवपूर्ण यह है कि उन्हें समझाया और शिक्षित किया जाय क्योंकि वे ही क्रान्ति की धुरी हैं। इस रूप में पी.सी. जोशी कम्युनिस्ट सांस्कृतिक नवजागरण के एक अग्रदूत थे, जैसा कि अनिल राजिमवाले मानते हैं।&lt;br /&gt;1939-1945 के महासमर के दौरान वह कम्युनिस्ट पत्रकारों से कहते कि उन्हें फ्रन्ट पर जाकर रिपोर्टिंग करनी चाहिए ताकि वह प्रामाणिक हो सके। वह सामान्य से फौरी मुद्दों एवं संघर्षों को स्वाधीनता संग्राम और साम्यवादी क्रान्ति के बृहत्तार सन्दर्भ में देखते-समझते। सुब्रत बजर्नी के लेखन में एहसास यह भी होता है कि पी.सी. जोशी हर क्षण एक सकारात्मक एवं प्रेरणादायी उपस्थिति होते । पार्टी द्वारा दरकिनार और अवमानित किये जाने के बावजूद वह आजीवन पार्टी और उसके सिध्दान्तों के प्रति जिसे उन्होंने एक खतरनाक दौर से बचाया और सींचा था, वफादार बने रहे, और किसी के प्रति उनके मन में कोई गिला नहीं था। इतने सारे कटु अनुभवों ने उन्हें कभी तिक्त नहीं बनाया। वह सचमुच बड़े थे। उन्होंने अल्मोड़ा की बाहरी सरहद पर एक 'हिमालय सोशलिस्ट आश्रम' बनवाया था जो महात्मा गांधी के आश्रमों की याद दिलाता था। उनके पास कुछ भी व्यक्ति नहीं था। वह एक कम्युनिस्ट तपस्वी थे। समय आया है जब पूरन चन्द्र जोशी को उनके समग्र में देखा जाय। विचारधारात्मक कठमुल्लापन और राजनीतिक महात्तवाकांक्षाओं ने जितनी राख उस देशज कम्युनिस्ट शिल्पी पर फेंकी है उसे हटाया जाय। उनका पुनर्मूल्यांकन, ईमानदार मूल्यांकन ही उनके इस शताब्दी वर्ष में उनके प्रति वास्तविक श्रध्दाजंलि होगी।&lt;br /&gt;(लेखक पी. एन. सिंह, 'समकालीन सोच-41' से साभार)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-2315747384036911930?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/2315747384036911930/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=2315747384036911930' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/2315747384036911930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/2315747384036911930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/06/blog-post_23.html' title='भारतीय साम्यवाद के शिल्पी पी. सी. जोशी'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-376915752563681369</id><published>2007-06-18T04:21:00.000-07:00</published><updated>2007-06-18T04:21:38.221-07:00</updated><title type='text'>आज़ादी के नाम पर 1947 का समझौता 1857 की क्रान्ति के शहीदों के प्रति एक बड़ा धोखा था</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RnZqgYrIWmI/AAAAAAAAAAU/SgxQsagqp1U/s1600-h/1857.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5077362734518524514" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/__o0pgp2pO0s/RnZqgYrIWmI/AAAAAAAAAAU/SgxQsagqp1U/s320/1857.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;फैजाबाद, 10 जून। डॉ. रमाशंकर तिवारी त्रिभुवन ट्रस्ट द्वारा प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 150वीं वर्षगाँठ के सन्दर्भ में ''1857 : मुक्तिसंघर्ष का पुनर्स्मरण'' विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी के मुख्य वक्ता श्री सुधीर विद्यार्थी थे। श्री विद्यार्थी ने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और क्रान्तिकारियों के जीवन पर कई पुस्तकें लिखी हैं। गोष्ठी के प्रारम्भ में श्री आफताब रज़ा रिज़वी ने फैजाबाद शहर के सन्दर्भ में स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को याद करते हुए कहा कि मौलवी अहमदुल्लाह शाह, मंगल पाण्डे, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक़ उल्लाह खाँ जैसे व्यक्तित्व, जो फैजाबाद से जुड़े हुए थे, उनकी स्वाधीनता के सतत संग्राम में बड़ी भूमिका थी। कार्यक्रम के संयोजक-संचालक श्री रघुवंशमणि ने आधार वक्तव्य रखते हुए कहा कि मौलवी अहमदुल्लाह शाह का 10 मई, 1857 से कुछ दिन पूर्व फैजाबाद में दिया गया व्याख्यान अत्यन्त महत्वपूर्ण था। उन्होंने बताया कि 1857 को याद करते हुए हमें उसके बाद हुए भ्रामक और पूर्वाग्रहपूर्ण इतिहास लेखनों की बजाय काफी बाद में नयी दृष्टि को लेकर लिखे गये इतिहास को अधिक तरजीह देनी चाहिए। स्वतंत्रता के उस पहले संग्राम को तत्कालीन राजनीतिक प्रभुत्व के बरअक्स देखते हुए तत्कालीन साम्राज्यवाद के सन्दर्भ में आज के नये आर्थिक साम्राज्यवाद को समझना भी अत्यन्त आवश्यक है।&lt;br /&gt;गोष्ठी के मुख्य वक्ता श्री सुधीर विद्यार्थी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए कहा कि फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्लाह शाह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के अनोखे लड़वैया थे। शाहजहाँपुर में उन्हें राजा जगन्नाथ सिंह की गढ़ी पर शहादत मिली। यह अजीब संयोग हैं कि 1857 में फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्लाह शाह शाहजहाँपुर में शहादत पाते हैं और 1925-27 के दौरान शाहजहाँपुर के अशफाक़ को फैजाबाद में फांसी होती है, ऐसा लगता है कि फैजाबाद का कोई कर्ज़ था, जिसे शाहजहाँपुर ने उतारा।&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि भारत में 1857 की क्रान्ति एकाएक नहीं हुई, उसके पीछे एक लम्बी पृष्ठभूमि थी। यह ध्यान देने योग्य बात है कि इस पृष्ठभूमि के तमाम महत्वपूर्ण बिन्दु अनदेखे रह गये। इस सन्दर्भ में आज हिन्दी साहित्य में चल रही यह बहस कि 1857 की क्रान्ति मात्र एक सैनिक विद्रोह था या एक जनक्रान्ति, बड़ी बेमानी नज़र आती है। बड़ा प्रश्न यह है कि यदि 1857 की क्रान्ति पूर्णतया सफल हो जाती तो आज हमारी राष्ट्रीयता का स्वरूप कैसा होता। शायद तब आज के नवसाम्राज्यवाद की जगह देशी किस्म का पूँजीवाद होता, लेकिन शायद तब देश का बँटवारा नहीं होता, हिन्दू मुसलमान के बीच इतनी दूरियाँ नहीं होतीं, शायद तब हमारे देश में अयोध्या जैसी घटना न हुई होती। 1857 को याद करते हुए यह भी जानना दिलचस्प है कि आज 2007 में महिलाएँ संसद में अभी अपनी सुनिश्चित भागीदारी नहीं पा सकी हैं, लेकिन 150 साल पहले के संग्राम में महिलाओं की व्यापक हिस्सेदारी थी। रानी लक्ष्मीबाई, बेग़म हज़रत महल, ऊदादेवी आदि के नाम उदाहरण भर हैं। 1857 की क्रान्ति का अंग्रेज़ों द्वारा पुरज़ोर दमन हुआ, लेकिन हमें यह मानना होगा कि उसके बाद भारत की मुक्ति को लेकर हुए हर आन्दोलन का बीज 1857 की उसी क्रान्ति में ही है। कई बार लगता है कि आज़ादी के नाम पर 1947 में जो समझौता हुआ, जिसने न सिर्फ देश को बाँटा, अपितु उसकी सम्प्रभुता पर भी चोट की, वह 1857 की क्रान्ति के शहीदों के प्रति एक बड़ा धोखा था। वस्तुत: 1942-43 तक आते-आते क्रान्ति इस परिपक्वता तक पहुँच गई थी और इस बिन्दु पर समझौते से मिली आज़ादी उचित नहीं थी।&lt;br /&gt;आज 1857 का पुनर्स्मरण के अवसर पर तत्कालीन सामंतवाद के नये रूप में उपस्थित भूमण्डलीकरण और बाज़ार के नवसाम्राज्यवाद के खतरे को देखते हुए लगता है कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई - ''अभी एक और इन्कलाब बाक़ी है, अभी अवाम पर सारा हिसाब बाक़ी है''। आज 1857 को याद करते हुए हमें कोशिश करनी चाहिए कि इतिहास के लोक और सामान्यपक्ष की अवहेलना न हो। हमने पाया है हमारे शहीदों की याद को विचारकों और बुध्दिजीवियों से अधिक लोक और समाज के छोट घटकों ने बचाया है। इस पहले स्वाधीनता संग्राम का सन्देश यही है कि जो लड़ाई साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से अधूरी रह गई थी, उसे हम सब फिर से लड़ने का संकल्प लें। यही उस क्रान्ति को याद करने की सबसे बड़ी प्रासंगिकता होगी।&lt;br /&gt;कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कवि-सम्पादक श्रीप्रकाश मिश्र ने अपना लिखित आलेख पढ़ा। उन्होंने इतिहास दृष्टि की समीक्षा के पहलुओं से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि तत्कालीन भारतीय उद्योगों पर शासकीय प्रहार को आर्थिक दमन के एक बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कार्लमाक्र्स और एंगेल्स के भारतीय क्रान्ति सम्बन्धी विचारों को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि इन चिन्तकों ने भारतीय विद्रोहियों का पक्ष नहीं लिया। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि 1857 की क्रान्ति मात्र एक सैनिक विद्रोह नहीं बल्कि हिन्दी प्रदेश की राष्ट्रीयता का समूचा विस्फोट था।&lt;br /&gt;कार्यक्रम के अन्त में ट्रस्ट की प्रबन्ध-निदेशिका सुश्री मंजुलरानी त्रिपाठी ने अतिथियों के प्रति आभार-ज्ञापन किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि श्री प्रेमशंकर मिश्र, स्वप्निल श्रीवास्तव, अनिल कुमार सिंह, विशाल श्रीवास्तव, अनुराग मिश्र, प्रमोदकान्त मिश्र, परेश कुमार पाण्डेय आदि सहित शहर के तमाम गणमान्य नागरिक एवं प्रबुध्दजन उपस्थित थे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-376915752563681369?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/376915752563681369/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=376915752563681369' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-7504391326753900039</id><published>2007-06-14T07:26:00.001-07:00</published><updated>2007-06-14T07:26:46.458-07:00</updated><title type='text'>आलोचना के लिए कुछ भी पवित्र नहीं ____ रघुवंश मणि</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:85%;"&gt;संस्कृति की नगरी वाराणसी में 5 और 6 मई को हिन्दी की प्रसिध्द छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा पर आयोजित एक संगोष्ठी 'महादेवी वर्मा: वेदना और विद्रोह' ने अकारण विवाद का रूप ले लिया। इस गोष्ठी के समापन सत्र में हिन्दी के शीर्षस्थ आलोचक डॉ। नामवर सिंह ने महादेवी के साहित्य पर चर्चा करते हुए कहा कि छायावादी साहित्य में प्रसाद, पंत और निराला को लेकर कविता की जो त्रयी बनायी जाती है उससे सुमित्रानंन्दन पंत का नाम हटा कर महादेवी वर्मा का नाम डाल दिया जाना चाहिए क्योंकि महादेवी के साहित्य की गुणवत्ता में एक तरह की सुसम्बध्दता और निरंतरता है जबकि पंत के साहित्य में काफी कुछ ऐसा है जो श्रेष्ठ नहीं। उन्होंने थोड़ा आगे बढ़कर कहा कि पंत के साहित्य का दो तिहाई हिस्सा 'कूड़ा' है।&lt;br /&gt;डॉ. नामवर सिंह का यह कहना था कि अब इस 'कूड़ा' शब्द को लेकर विवाद प्रारम्भ हो गया। दूसरे दिन ही एक अखबार ने नामवर सिंह के वक्तव्य के इस हिस्से को शीर्षक बनाकर छाप दिया और एक संगठन ने इसके विरुध्द वक्तव्य ही दे डाला। परिणाम स्वरूप अगले दिन अखबार वालों ने कार्यक्रम के आयोजकों में से एक डॉ. सदानन्द शाही को पकड़ा और उनसे प्रश्न किये। उन्होंने नामवर जी के वक्तव्य पर सफाई देते हुए कहा कि किसी भी बड़े लेखक में सब कुछ अच्छा ही नहीं होता। काफी कुछ कम स्तरीय भी होता है। उन्होने बात को साफ करते हुए कहा कि तुलसीदास जैसे बड़े कवि में भी सब कुछ बहुत अच्छा नहीं है।&lt;br /&gt;दूसरे ही दिन यह बात हवा में आ गयी कि डॉ. नामवर सिंह ने पंत को कूड़ा कहा था पर सदानन्द शाही ने तो तुलसीदास को भी कूड़ा कह दिया। तुलसी को तो छोड़िये, जोड़ दिया गया यह कि उन्होंने तो रामचरित मानस को ही कूड़ा कह दिया है। इस तरह के प्रस्तुतिकरण का उद्देश्य रामचरितमानस जैसे धार्मिक महत्व के ग्रंथ के नाम पर जनभावनाओं को उभारना था ही, मगर बात यहीं तक नहीं रुकी। नामवर सिंह और सदानन्द शाही का विरोध करने वालों ने साहित्य के इस मुद्दे को पुलिस तक पहुँचा दिया। वाराणसी की एक कोतवाली में डॉ. नामवर सिंह और सदानन्द शाही के विरुध्द एक तहरीर लिखायी गयी जिसमें यह कहा गया कि डॉ. नामवर सिंह और सदानन्द शाही ने 'मानवतावादी, राश्ट्रवादी एवं गाँधीवादी कवि सुमित्रानन्दन पंत के साहित्य को कूड़ा कह कर राष्ट्र का अपमान किया है और यह एक संगीन राष्ट्रीय अपराध है। बाद में सदानन्द शाही और नामवर सिंह पर मुकदमा भी थोप दिया गया।&lt;br /&gt;सौभाग्य से इस टिप्पणी का लेखक स्वयं महादेवी वर्मा की जन्मशताब्दी पर आयोजित उक्त संगोष्ठी में उपस्थित था। वहाँ नामवर जी का यह वक्तव्य कार्यक्रम के समापन सत्र के दौरान आया था। इस टिप्पणी के बाद वहाँ कोई खास विवाद नहीं खड़ा हुआ। बल्कि लोगों ने इसे बड़े सामान्य भाव से लिया। कुछ लोगों ने तो इसे नामवर सिंह द्वारा जन्मशताब्दी कार्यक्रम के उपलक्ष्य में महादेवी वर्मा के पक्ष में की गयी एक भावुक टिप्पणी माना। मगर किसी को भी यह आशा न थी कि यह साहित्यिक बहस पुलिस तक चली जायेगी। साहित्य में अक्सर दरोगा या सिपाही जैसे आलोचक मिलते रहे हैं, मगर साहित्य को वास्तविक दरोगा/ सिपाही के पास विमर्श हेतु जाना पड़ेगा, यह किसी ने सोचा भी न था। तहरीर लिखाने वालों में प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र और अशोक पाण्डेय का नाम है जो भाजपा से जुडे हैं। विश्वस्त सूत्रों की जानकारी के अनुसार यही वे लोग थे जिन्होने वाराणसी में 'वाटर' जैसी उच्चस्तरीय फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में बाधा पहुँचायी थी और तोड़-फोड़ की थी। आज जो लोग 'वाटर' फिल्म देखते हैं वे समझ सकते हैं कि इस फिल्म में विवाद लायक कुछ भी नहीं था।&lt;br /&gt;अपनी टिप्पणी में नामवर जी बस इतना कहना चाहते थे कि छायावादी कवियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और इस सन्दर्भ में महादेवी वर्मा के महत्व को स्वीकार किया जाना चाहिये। उनके कहने का मन्तव्य इतना भर था कि सुमित्रानन्दन पंत के साहित्य में साहित्यिक गुणवत्ता कहीं ज्यादा है तो कहीं कम। मगर महादेवी वर्मा के साहित्य में गुणवत्ता का स्तर एक जैसा है। यहाँ उनका उद्देश्य पंत के साहित्य को बेकार कहना नहीं था। यह वास्तव में एक प्रकार का तुलनात्मक विमर्श था जो अक्सर साहित्य में चलता ही रहता है। नामवर जी ने विजयदेव नारायण साही की उस टिप्पणी की ओर भी संकेत किया था जिसमें उन्होने कहा था कि उन्होंने न तो पंत की रचना लोकायतन पढ़ी है न पढ़ेंगे। साही जी के इस वक्तव्य का भी मतलब यही था कि लोकायतन एक अच्छी कृति नहीं है। 'लोकायतन की साहित्यिक गुणवत्ता को लेकर कोई बड़ा विवाद नहीं है। लगभग सभी लोग इसे पंत जी की कमजोर रचना मानते हैं। तो क्या इस प्रकार की टिप्पणी के लिए साही जी को प्रताड़ित किया जाता। बहरहाल उस समय इलाहाबाद में किसी ने पुलिस के पास जाने की बात तो नहीं ही सोची थी।&lt;br /&gt;पूरे आलोचना के इतिहास में आलोचना का धर्म ही प्रश्न पूछना रहा है। आलोचना ही क्या चिन्तन के ही अन्तरतम में प्रश्न पूछना रहा है। ग्रीक चिन्तन के सबसे पहले विचारक सुकरात ने प्रश्न पूछने से ही अपना चिन्तन प्रारम्भ ही किया था। वेदों की भी प्राश्निकता ही उन्हें आधुनिक महत्व का बनाती हैं। यदि ऐसा न होता तो वे सिर्फ पूजा-पाठ और ऐतिहासिक महत्व की कृतियाँ भर रह जातीं। पूरा का पूरा आधुनिक चिन्तन प्रश्न को ही महत्व देता है। भारत का नवजागरण भी क्या होता यदि प्राश्निकता उसके केन्द्र में न होती। सती प्रथा जैसी अमानवीय चीज का किस प्रकार उच्छेदन हो पाता। आलोचना के केन्द्र में भी प्रश्न पूछना ही रहा है और यही उसकी मूल प्रवृत्ति रही है। इस प्रश्न पूछने से अलग आलोचना का क्या अस्तित्व है? यही प्राश्निकता है जो कि हर युग में साहित्य के पाठ पुनर्पाठ, मूल्यांकन-पुनर्मूल्यांकन की ओर ले जाती रही है।&lt;br /&gt;आलोचना के लिए कुछ भी पवित्र नहीं क्योंकि किसी भी विषय को पवित्र मान लेने पर उस पर किसी भी प्रकार की टीका टिप्पणी सम्भव नहीं रह जाती। अब यदि हम गाँधी या पंत को अथवा उनके साहित्य को पवित्र मान लें तो फिर उनके साहित्य पर किसी प्रकार का विचार व्यक्त करना सम्भव नहीं रह जायेगा। तुलसी के विषय में भी यही बात लागू होगी। ऐसे में आलोचना का प्रश्न ही तिरोहित हो जाता है। किसी भी लेखक की रचना आलोचना के लिए पवित्र नहीं वह निर्वचन, व्याख्या और मूल्यांकन की विषयवस्तु है। जब यहाँ पर मैं आलोचना की बात कर रहा हूँ तो इसके बड़े व्यापक अर्थ हैं। आज के दौर में आलोचना सिर्फ किताबों पर टीका टिप्पणी तक सीमित नहीं। वह सभ्यता और संस्कृति की आलोचना तक पहुँच गयी है।&lt;br /&gt;इन परिस्थितियों में यदि किसी पुस्तक या लेखक पर की गयी टिप्पणी ही बर्दाश्त नहीं तो फिर आगे की तो बात ही क्या की जाय। भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में इस प्रकार के प्रतिबंध वास्तव में शर्मनाक और चिन्ताकुल करने वाले हैं। पहले भी तमाम लेखकों और रचनाकारों को संस्कृति की ठेकेदारी करने वालों के द्वारा परेशान किया जाता रहा है। नामवर सिंह के मामले में यह किसी भी विचारक को अपने विचार व्यक्त करने से सीधे रोकने का प्रयास नहीं है। यह परोक्षरूप से यह बताने का प्रयास है कि किसी भी विचाारक को कानूनी तरीके से परेशान किया जा सकता है और ऐसी सामर्थ्य संस्कृति के ठेकेदार रखते हैं। इसका व्यापक विरोध होना ही चाहिए। पर मेरे विचाार से यह अब कानून की धाराओं पर भी विचार करने का समय है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में तरह तरह से बाधक हैं।&lt;br /&gt;धारा 153ए जिसके तहत नामवर सिंह और सदानन्द शाही पर षत्रुता फैलाने और सौहार्द्र बिगााड़ने का आरोप है, वह इस पूरे प्रकरण को देखते हुए हास्यास्पद और केवल परेशान करने के उदद्ेश्य से प्रेरित है। वास्तव में यह अपने विरोधियों को विचार न व्यक्त करने देने का प्रयास ही है। मगर बात यह है कि ये लोग अपने से अलग मत रखने वालों के साथ ऐसा करने में सफल हैं और भविष्य में भी किसी भी विचारक के विरुध्द ऐसा किया जाना संभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;365, इस्माईलगंज, अमानीगंज, फैजाबाद, उ.प्र./ दूरभाश 09336624709 ईमेल raghuvanshmani@yahoo.co.in&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/447751428166973488-7504391326753900039?l=nayasamay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://nayasamay.blogspot.com/feeds/7504391326753900039/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=447751428166973488&amp;postID=7504391326753900039' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7504391326753900039'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/447751428166973488/posts/default/7504391326753900039'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://nayasamay.blogspot.com/2007/06/blog-post.html' title='आलोचना के लिए कुछ भी पवित्र नहीं ____ रघुवंश मणि'/><author><name>विशाल श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://i202.photobucket.com/albums/aa157/vis0078/vishalpp2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-447751428166973488.post-2827634726212610189</id><published>2007-06-10T02:44:00.000-07:00</published><updated>2007-06-10T02:44:10.381-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="transl_class" id="0" title="Click to correct"&gt;जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध&lt;br /&gt;(विजय कुमार के लेख को पढ़ने के बाद)&lt;br /&gt;विजय कुमार का लेख 'कवित्ता ही कवित्ता है', संरचनात्मक स्तर पर एक कमज़ोर लेख है। तमाम बड़े प्रश्नों को उठाने के बाद भी यह लेख अपनी प्रश्नाकुलता की बजाय भदेस भाषा के प्रयोग और अनैतिक आक्षेपों के लिए अधिक जाना जाएगा। लेख की फिजूल चीज़ों को छोड़ते हुए यहाँ लेख के उन्हीं बड़े प्रश्नों पर बात करने की कोशिश की गई है, जिनका उत्तार दिया जाना आज की कविता के सन्दर्भ में प्रासंगिक भी है और आवश्यक भी।&lt;br /&gt;वाल्मीकि से लेकर अद्यतन हिन्दी कविता में भाषा और शिल्प के स्तर पर तमाम परिवर्तन आये हैं। इन लगातार परिवर्तनों के बाद भी कविता के सम्बन्ध में एक शाश्वत सत्य है, वह यह कि 'कविता' के मौलिक औजार आज भी वही हैं, उन्हें बदलना न सम्भव है और न ही उचित। इस सन्दर्भ में आज जब यह प्रश्न उठता है कि 'नया क्या है?' तो कुछ बातों पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;विजय कुमार जी ने शिल्प की नव्यता के बारे में बात की है। यह निश्चित है कि कविता ने कई बार अपने शिल्प को तोड़ा है और उसमें बदलाव किये हैं, लेकिन क्या हर बार आवश्यक रूप से कविता से इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने पूर्ववर्ती शिल्प को तोड़े ही। शिल्प को तोड़ने की इस माँग के पीछे भी कुछ निश्चित कारण होने चाहिए। कविता का इतिहास यह बताता है शिल्प का टूटना किसी आवश्यक दबाव या माँग के चलते कभी सम्भव नहीं हुआ है, वह पूरी सहजता के साथ हुआ है और इसके सबसे बड़े उदाहरण निराला हैं। इसके विपरीत यदि आज हर कवि से यह आशा करेंगे कि उसे शिल्प बदलना ही है तो निश्चित रूप से वह उसके लिए योजनाबध्द प्रयास करेगा और यह प्रयास उसकी कविता में अलग से जाहिर होगा। यह सप्रयास शिल्प का परिवर्तनीकरण कहीं न कहीं कविता को पृष्ठभूमि में ले जाएगा और हाल के समय में ऐसे असफल प्रयोगों के उदाहरण भी कम नहीं हैं।&lt;br /&gt;मैं विनम्रता पूर्वक विजय कुमार जी से यह कहना चाहूँगा कि क्या यह विचार बार-बार हमें उसी पुरानी बहस 'टेक्स्ट' और 'फॉर्म ऑफ टेक्स्ट' के करीब नहीं ले जाता है। प्राय: जिन कविताओं को पूर्ववर्ती कविता-परम्परा को तोड़ने वाला माना जाता है वहाँ मुख्य रूप से फॉर्म का नयापन मिलता है। सोच का विषय है कि क्या सिर्फ फॉर्म का नयापन कविता के बोध को ग्रहण करने में किसी नयेपन की सृष्टि करता है। वस्तुत: नई और पुरानी कविता की जगह कविता-अकविता के भेद की बात को उठाना अधिक सार्थक होगा। वर्णन की शैली और काव्य-भंगिमा का अन्तर अपने-अपने स्तर पर यह कवि के यहाँ अलग-अलग होता है, विचार किया जाना चाहिए कि क्या मात्र काव्य-भंगिमा के आधार पर कवित्व का निर्धारण सम्भव है? यहाँ हम यह सोचने को विवश होते हैं कि शिल्प को लेकर अत्यधिक उत्सुकता और आग्रह कविता के मौलिक आस्वाद को कितना प्रभावित करेगा?&lt;br /&gt;दूसरी बात यह कि, 'कविता के नये प्रतिमान' के लगभग 40 साल बाद आज भी उसकी भूमिका में उठाया गया यह सवाल प्रासंगिक बना हुआ है कि 'नया क्या है?' के साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि 'कविता क्या है?'। यह उस समय की एक बड़ी बहस थी कि नई कविता के प्रतिमान की बजाय अच्छी कविता के प्रतिमान की बात उठाना अधिक उचित होगा। साही ने कहा था कि ''समूची नई कविता को ठीक-ठीक देखने के लिए नई कविता के प्रतिमान की ज़रूरत नहीं है, बल्कि कविता के नए प्रतिमान की जरूरत है''। इस सन्दर्भ में आज यह देखना अधिक सार्थक होगा कि नई पीढ़ी के कवियों के पास कथ्य के स्तर पर वैविध्य है, उनके पास अनुभव और प्रेक्षण के स्तर पर अलग-अलग सरोकार और चिन्ताएँ हैं और इन कवियों के पास संवेदना और अभिव्यक्ति के स्तर पर अपनी परम्पराओं से जुड़े रहकर कविकर्म को बचाये रखने की क्षमता भी है।&lt;br /&gt;विजय कुमार जी ने आज की युवा पीढ़ी की कविता को लेकर परम्परा और प्रतिबध्दता को लेकर भी प्रश्न उठाया है। परम्परा के बारे में बात करते समय यह जानना ज़रूरी है कि क्या यह मान लेना आसान है कि जिसे हम परम्परा कह रहे हैं, वह मात्र इतिहास का नैरंतर्य है? वस्तुत: सच्चाई यह है कि विचाराधाराओं के आग्रह से परे जाकर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हिन्दी साहित्य में मात्र एक परम्परा नहीं है। यह बात एक ब्यापक बहस का हिस्सा है, परन्तु निश्चित रूप से यह मानना उचित होगा कि आज की कविता किसी एक परम्परा से नहीं उपजी है। ऐसे में यह निरीक्षण आवश्यक है कि ऑब्जेक्टिव रूप से हर कवि कौन सी परम्परा से स्वयं को जुड़ता हुआ पाता है। वस्तुत: 80 के दशक के बाद की कविता को लेकर अभी यह निरीक्षण होना बाकी है। इसी तरह यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रतिबध्दताएँ अलग-अलग हो सकती हैं और ऐसा होना उचित है। कभी-कभी कवि गैरप्रतिबध्द होने का दावा भी करते हैं, तो किसी विचारधारा के सन्दर्भ में प्रतिबध्द न होना भी एक विशेष किस्म की प्रतिबध्दता ही हो सकती है। आज की युवा पीढ़ी नितान्त अलग-अलग किस्म के अनुभवों से प्रेरित है, और लोक तथा विचार के स्तर पर उसकी कविता में वैविध्यपूर्ण परम्परा-बोध और प्रतिबध्दताएँ हैं। आवश्यक है कि आज की कविता में उपस्थित इन छवियों को ठीक तरह से चिह्नित किया जाए।&lt;br /&gt;मैं विजय कुमार जी से यह कहना चाहूँगा कि अगर नब्बे के दशक के बाद की कविताओं में यह चीज़ें नहीं देखी गयी हैं, तो यह कविता की नहीं अपितु एक बड़े स्तर पर आलोचना की समस्या है। ज्याद काम करने की आवश्यकता आलोचना में हैं, कविता तो अपना काम कर ही रही है।&lt;br /&gt;नामवर जी ने कभी लिखा था ''मूल्यवान है एक भी ऐसे आलोचक का होना, जो किसी भी चीज़ को तब तक 'अच्छा' न कहे जब तक उस निर्णय के लिए वह अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार न हो।'' आज सबसे बड़ी और नितान्त आवश्यकता समकालीन कविता के सही और तटस्थ मूल्यांकन की है। आलोचना को लेकर एक सार्थक बहस का निर्माण होना चाहिए जिससे समकालीन कविता की नयी पीढ़ी को उसके पूरे समूचेपन में देखा जा सके। यह विडम्बना ही है कि हिन्दी कविता में आलोचना की स्थिति पर एक वरिष्ठ कवि को कहना पड़ता है कि ''सम्बन्धवाद और सत्ता प्रतिष्ठान की दुरभिसन्धियों ने हिन्दी में आलोचनात्मक विचार की प्रक्रिया और सम्भावना और अवरुध्द कर रखा है''। प्राय: यह कहा जाता है कि आठवें दशक के बाद की हिन्दी कविता में एक गतिरोध है। मेरा यह मानना है इसके सापेक्ष एक बड़ा गतिरोध हिन्दी कविता की आलोचना में है। आखिर क्या कारण है कि हमारे पास 'कविता के नये प्रतिमान' जैसी दूसरी किताब नहीं है। यह कह देना आसान है कि आठवें दशक के बाद कविता नहीं लिखी गई और ज्ञानरंजन के बाद कहानी नहीं लिखी गई, लेकिन इस बात पर भी गौर होना चाहिए कि छिटपुट समीक्षाओं और निबन्धों के संग्रह के अतिरिक्त कविता की आलोचना में ऐसा कौन सा महत्वपूर्ण कार्य हुआ जो हमारे समय की कविता की गिरह-गाँठें खोल सके। सिर्फ कवियों को उनकी अलग-अलग काव्य-शैलियों से पहचानना अगर महत्वपूर्ण होता तो आचार्य शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास महत्वपूर्ण न होता, उससे पहले लिखे गए ग्रन्थ अधिक महत्वपूर्ण होते। आलोचना सिर्फ रचना को शिल्प और कथ्य के स्तर पर खोलने का नाम नहीं है, अच्छी आलोचना रचना के साथ-साथ रचना-समय को पारिभाषित करती है। तो यह जो आलोचना का गतिरोध है, यह अधिक प्रभावित कर रहा है हमारे समय की रचनाशीलता को। आज तो प्राय: हमें कविता की आलोचना के नाम पर 'स्यापे' और 'रुदालियाँ' ही देखने को मिलती हैं।&lt;br /&gt;यह एक बड़ा प्रश्न है, 'स्वीकृति' नहीं तो 'नकार' ही सही, आज के कवि को कुछ तो दीजिये। आलोचना के नाम पर यह सन्नाटा निश्चित रूप से कविता के लिये भयावह है। यह एक अजीब किस्म का मौन है, अजीब इसलिए क्योंकि यह मौन एक बड़े शोर के बीच उपस्थित है। शायद यही कारण है कि मंगलेश जी लिखते हैं ''लगभग 150 साहित्यिक पत्रिकाएँ इस समय मौजूद हैं, जिनका एक बड़ा हिस्सा आलोचना को समर्पित है। तब भी अगर कोई सार्थक बहस नहीं बन पा रही है और तमाम कवियों को शिकायत है कि यह उनकी अनदेखी करती आलोचना है, तो मेरे ख्याल से सभी आलोचकों को किसी जगह मिलकर इसके बारे में सोचना चाहिए।''&lt;br /&gt;आज का युवा कवि निश्चित रूप से अस्वीकृति से अधिक अनदेखेपन के खतरों से घबराता है। उसे दरकार है आलोचना की सम्यक् दृष्टि की। हम उम्मीद करते हैं कि ऐसी आलोचना-दृष्टि का विकास सम्भव होगा।&lt;br /&gt;समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध।&lt;br /&gt;जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध॥&lt;br /&gt;विशाल श्रीवास्तव&lt;br /&gt;5 / 2 / 70, साहबगंज, फैजाबाद&lt;br /&gt;मो. 9415468684&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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